विदेश » भारत और चीन के बीच बवाल हुआ तो किसका साथ देंगे पुतिन? रिश्तों की गहराई में छुपा है जवाब

भारत और चीन के बीच बवाल हुआ तो किसका साथ देंगे पुतिन? रिश्तों की गहराई में छुपा है जवाब

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मॉस्को: रूस दशकों से भारत का सबसे भरोसेमंद पार्टनर रहा है. सोवियत संघ के वक्त से चले आ रहे हैं इस रिश्ते को पुतिन बखूबी मेनटेन किया है. रूसी राष्ट्रपति भारत आने से पहले कई मौकों पर दुनिया के सामने ये ऐलान कर चुके हैं कि भारत उनके लिए बेहद अहम है और उसके साथ संबंध मजबूत करने का प्रयास जारी रहेगा. हालांकि, भारत के साथ रूस के लिए अब चीन भी अहम पार्टनर बन गया है. पुतिन अपनी हर स्पीच में चीन का भी नाम लेते हैं. ऐसे में ये सवाल कई बार उठता है कि अगर कभी भारत-चीन किसी मुद्दे पर लड़ते हैं तो पुतिन किसका साथ देंगे, कौन सा पार्टनर उनके लिए ज्यादा अहम होगा?

रिश्तों की गहराई में छुपा है जवाब

भारत के साथ रूस के रिश्ते एक ‘भरोसेमंद दोस्त’ जैसे हैं. सोवियत संघ के जमाने में रूस दुनिया का सबसे पावरफुल देश था, तब भारत के साथ उसका रिश्ता ‘रक्षक’ का था लेकिन अब भारत की तेजी से बढ़ती पावर के साथ इस डायनैमिक में बदलाव आया है. दोनों देश अब बराबरी के पार्टनर बन गए हैं और ये बदलाव रूस-भारत के रिश्ते को और भी तगड़ा कर गया है.

भारत और रूस के रिश्ते का आधार सैन्य सहयोग है. भारत के हथियार आयात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा रूस से ही आता है. इस सैन्य सहयोग का फोकस हथियार बेचने से लेकर टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण तक है, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल या S-400 एयर डिफेंस सिस्टम जैसी डील्स शामिल हैं.

रूस के लिए भारत दुनिया की पावर बैलेंस करने का केंद्र है. रूस भारत को हथियार बेचकर चीन के बढ़ते प्रभुत्व को बैलेंस करता है. रूस, पश्चिमी देशों के बढ़ते दबदबे को चुनौती देने के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण और मजबूत शक्ति मानता है, जो अमेरिका के वैश्विक एकाधिकार को तोड़ने में मदद कर सकता है.

चीन से मजबूरी का रिश्ता?

वहीं, चीन के साथ रूस का रिश्ता ऊपर से भले ही दोस्ती का दिखता हो लेकिन अंदर मजबूरियों की लेयर्स दिखाई देती हैं. ये संबंध चीन की बढ़ती ताकत पर टिका है. चीन, रूस का सबसे बड़ा और सबसे जरूरी आर्थिक पार्टनर है.
चीन भारी मात्रा में रूसी कच्चा माल (तेल और गैस) खरीदता है जबकि बदले में रूस को कंज्यूमर गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी बेचता है. इस रिश्ते में चीन का पलड़ा भारी है, क्योंकि रूस अब चीन के बाजार पर अत्यधिक निर्भर हो गया है. ऐसे में रूस जूनियर पार्टनर की भूमिका में पहुंच जाता है.

क्यों शक करता है रूस?

दोनों देश अक्सर संयुक्त सैन्य अभ्यास करते हैं, लेकिन रूस, चीन को अत्याधुनिक हथियार बेचने से झिझकता है, जिसके पीछे टेक्नोलॉजी को कॉपी करने का डर है. दोनों का रिश्ता एक मकसद की वजह से तगड़ा हुआ है, दोनों ही अमेरिका और पश्चिमी देशों के वैश्विक प्रभुत्व को खत्म करना चाहते हैं.

चीन ने कैसे दी रूस को चिंता?

रूस और चीन के बीच संबंध यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों से उपजे हैं. हालांकि, चीन रूस के लिए कई वजहों से चिंता का कारण भी बना हुआ है, खासकर मध्य एशिया और आर्कटिक में चीन की बढ़ती पावर पुतिन को पसंद नहीं आ रही है.

मध्य एशिया में, चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए से रूस को मुख्य ट्रेड पार्टनर के पद से हटा चुका है. तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों की गैस पाइपलाइनें अब रूसी नियंत्रण को दरकिनार करते हुए सीधे चीन तक पहुंचती हैं. ताजिकिस्तान चीन इलाकों को टारगेट कर रहा है, जहां पर पहले रूस सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है. विशेषज्ञों ने इन इलाकों में चीनी सुरक्षा चौकियों की पुष्टि की है.

आर्कटिक क्षेत्र में चीन की घुसपैठ से मॉस्को एलर्ट मोड पर है. चीन ने खुद को एक ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ घोषित किया है. जो एक तरह से रूस की क्षेत्रीय संप्रभुता के दावों को कमजोर करना है.

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