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Sydney Bondi Beach Shooting: सिडनी के आर्चर पार्क में यहूदी उत्सव पर हुए आतंकी हमले में सीरियाई मूल के अहमद मसीहा बनकर उभरे. 15 लोगों की मौत के बीच अहमद ने अपनी जान की परवाह किए बिना हमलावर से बंदूक छीन ली. शरीर पर 5 गोलियां खाने के बावजूद उन्होंने सैकड़ों बेगुनाह बच्चों और महिलाओं को बचा लिया. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर पीएम अल्बनीस ने उन्हें असली हीरो और प्रेरणा बताया है.
युवक ने खुद 5 गोलियां खाई थी. सिडनी बोंडी बीच शूटिंग: नफरत की आग जब मासूमों को निगलने पर आमादा थी तब एक शख्स ने अपनी जान की परवाह किए बिना मौत के सामने सीना तान दिया. 14 दिसंबर को सिडनी बीच पर आर्चर पार्क में आयोजित यहूदी समुदाय के उत्सव हनुक्का के दौरान हुए भीषण शूटआउट में 15 लोगों की जान चली गई लेकिन यह संख्या और भी भयानक हो सकती थी. अगर 43 वर्षीय अहमद अली हमद ने अपनी बहादुरी से उस आतंकी को निहत्था न किया होता, तो शायद लाशों का अंबार और बड़ा होता. अहमद ने बताया कि जब उनके सामने मासूमों की लाशें गिर रही थीं, तब उनकी आत्मा ने उन्हें एक्शन लेने को कहा.
मैंने हमलावर की पीठ पर छलांग लगाई
अहमद अली अहमद के CBC न्यूज से बातचीत में कहा, “मैंने हमलावर की पीठ पर छलांग लगाई और उसे दबोच लिया. चिल्लाकर कहा कि अपनी गन गिरा दो और यह कत्लेआम बंद करो.” सीने और कंधे पर पांच गोलियां झेलने वाले अहमद ने कहा कि उस वक्त उन्हें अपनी जान की कोई परवाह नहीं थी. उनका एकमात्र लक्ष्य हमलावर को निहत्था करना और लोगों को चीखते हुए देखने से रोकना था. अहमद ने भावुक होते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि वे कई मासूम बच्चों और महिलाओं को बचा सके लेकिन 15 लोगों को खोने का दुख आज भी उनके मन में है.
गोलियों के बीच फरिश्ता बना अहमद
दो बच्चों के पिता अहमद उस वक्त उत्सव का हिस्सा थे जब अचानक गोलियां चलने लगीं. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब हमलावर अंधाधुंध फायरिंग कर रहा था तब अहमद ने भागने के बजाय उसका मुकाबला करने का फैसला किया. अहमद की मां ने नम आंखों से बताया, “उसने देखा कि लोग मर रहे हैं. जैसे ही हमलावर की गोलियां खत्म हुईं अहमद ने अपनी जान जोखिम में डालकर उससे बंदूक छीन ली.”
गोली खाकर अहमद भी हुआ जख्मी
इसी संघर्ष के दौरान अहमद को एक नहीं बल्कि चार से पांच गोलियां लगीं. उनके कंधे और शरीर के ऊपरी हिस्से को गोलियों ने छलनी कर दिया लेकिन उन्होंने तब तक हमलावर को नहीं छोड़ा जब तक उसे निहत्था नहीं कर दिया. उनके पिता गर्व से कहते हैं, “जब अहमद ने वह सब किया तो वह यह नहीं सोच रहा था कि वह किन लोगों को बचा रहा है. उसके लिए बस इंसानियत मायने रखती थी.”
सीरिया की गलियों से ऑस्ट्रेलिया तक
अहमद मूल रूप से सीरिया के एक छोटे से कस्बे अल नायरब के रहने वाले हैं. 2000 के दशक के मध्य में वे एक बेहतर जिंदगी की तलाश में ऑस्ट्रेलिया आए थे. आज उनके गृह नगर में भी जश्न का माहौल है. उनके चाचा वाहिद अल अहमद कहते हैं, “अहमद बचपन से ही अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ रहा है. उसने आज साबित कर दिया कि बहादुरी की कोई सीमा या धर्म नहीं होता.”
अस्पताल से मिली छुट्टी
सेंट जॉर्ज अस्पताल में दो सप्ताह तक मौत से जंग लड़ने और कई सर्जरी से गुजरने के बाद रविवार को अहमद को छुट्टी दे दी गई. अस्पताल से बाहर आते वक्त उनके चेहरे पर संतोष था. उन्होंने भावुक होकर कहा, “मैं जानता हूं कि मैंने कई बेगुनाह बच्चों और महिलाओं की जान बचाई है लेकिन जो लोग मारे गए उनके लिए मेरा दिल आज भी भारी है.” उनकी इस बहादुरी ने पूरी दुनिया का दिल जीत लिया है. अहमद की मदद और शुक्रिया अदा करने के लिए शुरू किए गए एक ऑनलाइन फंडरेजर में 43,000 से अधिक लोगों ने 2.5 मिलियन डॉलर (लगभग 20 करोड़ रुपये) से ज्यादा की राशि दान की है.
पीएम और प्रीमियर ने दी सलामी
हमले के तुरंत बाद न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर क्रिस मिन्स ने अहमद से मुलाकात की और उन्हें रियल-लाइफ हीरो बताया. उन्होंने कहा, “अहमद ने भारी व्यक्तिगत जोखिम उठाकर एक आतंकवादी को निहत्था किया जिससे अनगिनत जानें बचीं. प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीस ने भी अस्पताल जाकर अहमद की हिम्मत की सराहना की और कहा, “उनकी बहादुरी सभी ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए एक प्रेरणा है.”
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें
December 29, 2025, 20:54 IST





