दुनिया के नक्शे पर एक लकीर खिंच गई है. यह लकीर डिप्लोमेसी और दादागिरी के बीच की है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने एक मिलिट्री ऑपरेशन से मिटा दिया है. ट्रंप ने जिस अंदाज में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से टंगवा लिया, यह किसी हॉलीवुड की एक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लग सकता है, लेकिन हकीकत में यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के ताबूत में आखिरी कील है.
वेनेजुएला में जो हुआ, उसे आप लोकतंत्र की बहाली का नाम दे सकते हैं, लेकिन तरीका बताता है कि हम एक ऐसे दौर में लौट आए हैं जहां जंगल का कानून चलता है- जिसकी लाठी, उसकी भैंस. जो ट्रंप दिन-रात शांति के नोबेल पुरस्कार का सपना देखते हैं, जो खुद को युद्ध रोकने वाला मसीहा बताते हैं, उन्होंने वेनेजुएला में जो किया, वह शांति नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के सिर पर नंगानाच है. अब बारी ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की है…
रिजीम चेंज का काउबॉय स्टाइल
अमेरिका का इतिहास रिजीम चेंज से भरा पड़ा है. लैटिन अमेरिका तो वैसे भी अमेरिका का बैकयार्ड माना जाता रहा है, जहां सीआई ने न जाने कितनी सरकारें गिराईं और कितने तख्तापलट करवाए. लेकिन पहले और अब में एक बड़ा फर्क है. पहले अमेरिका पर्दे के पीछे रहकर खेलता था. वह विद्रोहियों को हथियार देता था, आर्थिक प्रतिबंध लगाता था, या सेना को भड़काता था. खुद सामने आने से बचता था ताकि कह सके कि हमने कुछ नहीं किया, यह तो वहां की जनता का विद्रोह है.
लेकिन ट्रंप ने इस पुराने मैनुअल को फाड़कर फेंक दिया है. मादुरो को सीधे उठा लेना और देश से बाहर निकाल फेंकना, यह कूटनीति नहीं, यह गैंगस्टर स्टाइल ऑपरेशन है. यह तरीका बताता है कि अब अमेरिका को किसी बहाने की जरूरत नहीं है. अगर उसे कोई नेता पसंद नहीं है, तो वह कमांडो भेजेगा और उसे उठा लाएगा. यह ‘रिजीम चेंज’ का 2.0 वर्जन है, जो बेहद खौफनाक है. यह एक संप्रभु देश के राष्ट्रपति का अपहरण है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति ने अंजाम दिया है.
यूएन को ठेंगा…
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दयनीय स्थिति अगर किसी की है, तो वह है संयुक्त राष्ट्र की.ट्रंप ने मादुरो को हटाने का फैसला लिया, ऑपरेशन चलाया और दुनिया को बता दिया. इस बीच यूएन कहां था? अंतरराष्ट्रीय कानून कहां थे? किसी देश की संप्रभुता का सम्मान कहां गया? हकीकत यह है कि ट्रंप ने यूएन को ठेंगा दिखा दिया. संयुक्त राष्ट्र अब न्यूयॉर्क में बनी एक इमारत से ज्यादा कुछ नहीं है, जहां दुनिया भर के नेता साल में एक बार पिकनिक मनाने जाते हैं. जब बात अमेरिका के हितों की आती है, या ट्रंप की सनक की, तो यूएन के चार्टर की अहमियत रद्दी के कागज के बराबर भी नहीं रह जाती.
मादुरो का शासन चाहे कितना भी क्रूर क्यों न रहा हो, लेकिन एक देश के राष्ट्रपति को दूसरे देश की सेना द्वारा गिरफ्तार करना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मखौल उड़ाना है. अगर अमेरिका आज वेनेजुएला के साथ यह कर सकता है, तो कल किसी भी उस देश के साथ कर सकता है जो उसकी जी-हुजूरी नहीं करेगा. यूएन को ठेंगा दिखाकर अमेरिका ने साबित कर दिया है कि दुनिया में कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है, ताकतवरों के लिए नहीं.
नोबेल का ख्वाब और मादुरो का अपहरण
यह विरोधाभास देखिए. डोनाल्ड ट्रंप को लगता है कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए. वे अब्राहम एकॉर्ड्स की दुहाई देते हैं, वे दावा करते हैं कि वे नए युद्ध शुरू नहीं करते. लेकिन वेनेजुएला में उन्होंने जो किया, क्या वह शांति का मार्ग है?
शांति का नोबेल उन लोगों को मिलता है जो संवाद से, समझौते से विवाद सुलझाते हैं. बंदूक की नोक पर किसी नेता को गद्दी से उतारना और अपनी पसंद की सरकार थोपना, शांति नहीं है. यह साम्राज्यवाद का नया चेहरा है. ट्रंप शायद सोचते हैं कि मैंने एक तानाशाह को हटाया, इसलिए मैं मसीहा हूं. लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब अमेरिका ने दूसरे देशों में जबरन लोकतंत्र थोपने की कोशिश की है- चाहे वह इराक हो, लीबिया हो या अफगानिस्तान वहां शांति नहीं, बल्कि दशकों की अस्थिरता आई है.
क्या अब ईरान की बारी है?
मादुरो के हश्र को देखकर दुनिया के कई देशों की राजधानियों में पसीना छूट रहा होगा. सबसे बड़ा सवाल क्या अब ईरान की बारी है? वेनेजुएला और ईरान, दोनों ही अमेरिका विरोधी धुरी के अहम हिस्से रहे हैं. मादुरो का गिरना तेहरान के लिए खतरे की घंटी है. ट्रंप ने दिखा दिया है कि वे रेड लाइन पार करने में संकोच नहीं करते.
ईरान के सु्प्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और वहां की सरकार सोच रही होगी कि अगर मादुरो को उनके बेडरूम (या जहां से भी) से उठाया जा सकता है, तो वे कितने सुरक्षित हैं? हालांकि, ईरान और वेनेजुएला में फर्क है. ईरान की सैन्य क्षमता और उसका प्रॉक्सी नेटवर्क वेनेजुएला से कहीं ज्यादा मजबूत है. ईरान पर सीधा हाथ डालना अमेरिका के लिए भी आसान नहीं होगा और यह तीसरे विश्व युद्ध को न्योता देने जैसा होगा. लेकिन मादुरो एपिसोड ने एक मनोवैज्ञानिक दबाव तो बना ही दिया है. अब अमेरिका के दुश्मन चैन से नहीं सो पाएंगे. ट्रंप ने डर का व्यापार शुरू कर दिया है.
लेकिन ये कब तक चलेगा?
सवाल यह है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली यह नीति कब तक चलेगी? शॉर्ट टर्म में ट्रंप को वाहवाही मिल सकती है. उनके समर्थक इसे अमेरिकन पावर की वापसी कहेंगे. वे कहेंगे कि देखो, अमेरिका अब कमजोर नहीं है. लेकिन लॉन्ग टर्म में इसके परिणाम भयानक हो सकते हैं.
विश्वास का संकट: दुनिया का कोई भी देश अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करेगा. संप्रभुता का मतलब खत्म हो जाएगा. हर देश अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार या घातक मिसाइलें बनाने की दौड़ में लग जाएगा, क्योंकि उन्हें पता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून उन्हें नहीं बचा पाएगा.
बदले की आग: जब आप किसी देश के नेता को इस तरह अपमानित करके हटाते हैं, तो आप वहां की जनता के एक बड़े हिस्से को अपना दुश्मन बना लेते हैं. यह तरीका भविष्य में अमेरिका के खिलाफ नफरत और आतंकवाद को जन्म दे सकता है.
चीन और रूस का फायदा: अमेरिका की यह गुंडई छोटे देशों को चीन और रूस की गोद में धकेल देगी. वे सुरक्षा के लिए बीजिंग और मॉस्को की तरफ देखेंगे.





