अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप गाजा को फिर से बनाने, वहां स्थितियों को कंट्रोल में रखने और प्रशासन के लिए बोर्ड ऑफ पीस बना लिया है. उनकी ये गाजा नीति साफतौर पर संयुक्त राष्ट्र को किनारे करती हुई लगती है. जो काम संयुक्त राष्ट्र को करना चाहिए या उसे आगे लाना चाहिए था, वहां ट्रंप ने ये काम कर दिया है. उनका कहना है कि ये बोर्ड उनके 20-पॉइंट प्लान का हिस्सा है, जिसे UN सिक्योरिटी काउंसिल ने रेजोल्यूशन 2803 के माध्यम से समर्थन दिया है. लेकिन अब दुनियाभर में उनकी शैली के बाद आरोप लगने लगे हैं कि वो यूएन जैसी संस्थाओं के महत्व को लगातार कम करने का काम कर रहे हैं.
दरअसल ट्रंप प्रशासन को लगता है कि संयुक्त राष्ट्र वैश्विक संघर्षों को सुलझाने में विफल रहा है. इसी वजह से पीस ऑफ बोर्ड बनाना पड़ा है, जो अधिक फुर्तीला और प्रभावी विकल्प होगा. बोर्ड का चार्टर यूएन जैसी संस्थाओं की आलोचना करता है कि वे अक्सर असफल रहती हैं.
बोर्ड किस तरह का है
ये बोर्ड अमेरिका-केंद्रित वैकल्पिक ढांचा है. जो “ट्रंप यूनाइटेड नेशंस” जैसा लगता है, जो यूएन चार्टर के मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज करता है. इसमें शामिल होने के लिए देशों से कम से कम 1 बिलियन डॉलर का योगदान मांगा जा रहा है, जो इसे एक विशेष क्लब बनाता है. यूएन के वैश्विक मंच को चुनौती देता है. इसमें अमेरिका के नेतृत्व में चुनिंदा देश शामिल हैं, जैसे अर्जेंटीना और कनाडा के नेता.
नुकसान क्या होगा
प्लान में फिलिस्तीनियों की कोई सीधी भागीदारी नहीं है. यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों की बजाय एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल पर जोर देता है. आलोचकों का कहना है कि यह यूएन को कमजोर करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जहां अमेरिका यूएन से बाहर निकलने या फंडिंग कटौती जैसे कदम उठा रहा है. साथ ही दूसरी ग्लोबल संस्थाओं को भी लगातार कमजोर करने का काम कर रहा है.
कुछ विश्लेषकों के अनुसार, ये बोर्ड गाजा से आगे वैश्विक संघर्षों को सुलझाने का दावा करता है, जो UN की भूमिका को चुनौती देता है. चीन जैसे देशों ने इसकी अस्पष्टता पर चिंता जताई है, क्योंकि यह यूएन नहीं बल्कि अमेरिका के नियंत्रण में होगा. अमेरिका के इस कदम से दुनिया के बंटने का भी खतरा है.
हालांकि, ट्रंप प्रशासन का दावा है कि बोर्ड संयुक्त राष्ट्र को चुनौती देने के लिए नहीं है बल्कि गाजा पर फोकस करने के लिए है. फिर भी इस प्लान में सारा जोर इजरायल को और मजबूत करने के साथ उसके फायदे के हिसाब से चलने का है. इसमें इजराइल की सुरक्षा पर ज्यादा जोर है. ये फिलिस्तीनी अधिकारों को नजरंदाज करता है, जिससे विवाद बढ़ा है.
ट्रंप वैश्विक संस्थाओं को कमजोर क्यों कर रहे
ट्रंप प्रशासन की रणनीति अमेरिकी संप्रभुता, आर्थिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, जिसके चलते वे वैश्विक संस्थाओं को “व्यर्थ” या “अमेरिका विरोधी” मानते हैं.
ट्रंप का मानना है कि UN जैसी संस्थाएं अमेरिकी करदाताओं के पैसे को बर्बाद करती हैं. “ग्लोबलिस्ट एजेंडा” जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रवासन, लिंग समानता को बढ़ावा देती हैं, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं. जनवरी 2026 में उन्होंने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिकी को वापस लेने का आदेश दिया, जिसमें 31 यूएन इकाइयां शामिल हैं. वो WHO, पेरिस क्लाइमेट समझौते, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) से भी बाहर निकल चुके हैं.
क्यों यूएन के पीछे पड़े हैं
ट्रंप यूएन को अक्षम, महंगा और जवाबदेही की कमी वाला मानते हैं. वे कहते हैं कि ये संस्थाएं अमेरिकी नीतियों की आलोचना करती हैं. ठोस परिणाम नहीं देतीं.
ट्रंप का तर्क है कि ये संस्थाएं US की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करती हैं. उन्होंने UNFCCC (जलवायु समझौता) और IPCC जैसी एजेंसियों से निकलकर “ग्लोबल गवर्नेंस” को चुनौती दी . ट्रंप “वोक” एजेंडा जैसे डाइवर्सिटी, क्लाइमेट पॉलिसी को अमेरिकी मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। इससे यूएन की कई एजेंसियां प्रभावित हुई हैं.
दुनिया को क्या नुकसान होगा?
ट्रंप की नीतियां वैश्विक सहयोग को कमजोर कर रही हैं, जिससे लंबे समय में मानवीय, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं. अगर अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में फंडिंग खत्म की तो उसकी कई मुख्य एजेंसियां 30-40% सिकुड़ सकती हैं, जिससे 95 मिलियन लोग स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हो सकते हैं और 3 मिलियन से ज्यादा मौतें हो सकती हैं. शिक्षा से 23 मिलियन बच्चे प्रभावित होंगे.
ग्लोबल क्लाइमेट प्रयास कमजोर होंगे, जिससे अमेरिका खुद भी बाढ़, आग जैसे खतरों से प्रभावित होगा. WHO से निकलने से महामारी रोकथाम प्रभावित हुई है. हालांकि इससे दुनिया में अमेरिका का लीडरशिप रोल कमजोर होगा, चीन जैसे देशों को फायदा मिलेगा. लेकिन दुनिया में संघर्ष बढ़े तो संयुक्त राष्ट्र के शांति सेना के जरिए वहां शांति स्थापना में असर पड़ेगा. इस मामले में कुछ देश ट्रंप के पीछे पीछे चल रहे हैं लेकिन कुछ विरोध भी.
अगर संयुक्त राष्ट्र और कमजोर हुआ तो क्या होगा
1. अगर संयुक्त राष्ट्र संघ अगर और कमजोर हो जाएगा तो दुनिया पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं. UN और कमजोर हुआ, तो बड़े संघर्षों में कोई प्रभावी अंतरराष्ट्रीय दबाव या मध्यस्थता नहीं बचेगी. छोटे और कमजोर देशों को बड़ी शक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में “निगल” लिया जा सकता है. इतिहास में लीग ऑफ नेशंस के पतन के बाद द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था. ऐसा ही पैटर्न दोहराया जा सकता है.
2. UN की एजेंसियां UNHCR, WFP, UNICEF, WHO लाखों लोगों को भोजन, शरण, स्वास्थ्य और शिक्षा देती हैं. फंडिंग कट या अमेरिका जैसे बड़े दाता के बाहर निकलने से ये सेवाएं 30-50% तक सिकुड़ सकती हैं.
3. संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून की वैधता कमजोर होगी. देश अपनी मर्जी से आक्रामकता दिखाने लगेंगे. कुल मिलाकर वैश्विक सहयोग घटेगा. चीन और रूस जैसे देशों को फायदा मिलेगा।
4. WTO, IMF जैसी संस्थाएं कमजोर होने से वैश्विक व्यापार अस्थिर होगा. टैरिफ युद्ध बढ़ेंगे. छोटे देशों की आवाज दब जाएगी; वे क्षेत्रीय शक्तियों पर निर्भर हो जाएंगे. अमेरिका का प्रभाव भी लंबे समय में कम होगा, क्योंकि वह “लीडरशिप” खो देगा. चीन और रूस वैकल्पिक व्यवस्था बनाएंगे.





