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ईरान की इंजीनियरिंग क्यों मानी जाती है बेस्ट, SIT में दाखिला IIT से ज्यादा कठिन

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ईरान की इंजीनियरिंग का लोहा पूरी दुनिया मानती है, खासकर सिविल, मैकेनिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग में. ऐसा अब भी है. सदियों से इंजीनिरिंग के मामले में ईरान दुनिया में बहुत आगे रहा है. इसकी एक इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी को अब भी मध्य पूर्व का MIT कहते हैं. जानते हैं क्या है इसकी वजह. क्यों तमाम पाबंदियों. बंदिशों और प्रतिकूल हालात के बाद भी ईरान की इंजीनियरिंग और इंजीनिरिंग की पढ़ाई का लोहा पूरी दुनिया मानती है.

ईरान की ‘शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी’ को “मध्य पूर्व का MIT” कहा जाता है. यहां दाखिला लेना भारत के IIT से भी ज्यादा कठिन माना जाता है. सबसे तेज दिमाग वाले छात्र ही इंजीनियरिंग चुनते हैं. सिलिकॉन वैली में ईरानी प्रवासियों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क है, जिसे ‘शरीफ यूनिवर्सिटी एलुमनाई’ लीड करते हैं. वो गूगल, फेसबुक और एप्पल जैसी कंपनियों में बड़े पदों पर हैं.

दशकों से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से ईरान को अपनी जरूरत की हर चीज खुद बनानी पड़ी. चाहे वह मिसाइल तकनीक हो, परमाणु ऊर्जा हो, बांध हों या फिर नैनो-टेक्नोलॉजी, उन्होंने बाहरी मदद के बिना खुद को विकसित किया.

क्यों शरीफ यूनिवर्सिटी का इतना नाम

ईरान की इंजीनियरिंग और इंजीनियरिंग की पढ़ाई को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कहा जाना उसकी कुछ खूबियों की वजह से है. शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में लगातार उच्च स्थान प्राप्त करता है. इसके कई प्रोफेसरों ने दुनिया के टॉप संस्थानों से शिक्षा हासिल की है. इसके अलावा यहां की तरबियत मोदारेस यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान एडवांस मटेरियल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अपने उल्लेखनीय शोध के लिए जाने जाते हैं.

ईरान में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए छात्रों का चयन बेहद प्रतिस्पर्धी और कठिन परीक्षाओं के माध्यम से होता है, जिससे सबसे होनहार दिमाग ही इस क्षेत्र में आते हैं. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2018 में एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में स्नातक करने वाले छात्रों में से लगभग आधे छात्र ईरान के थे.

ईरान का क्राउन ज्वेल

शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (SUT) को ईरान का ‘क्राउन ज्वेल’ माना जाता है. दुनियाभर के टॉप टेक संस्थानों और नासा जैसे संगठनों में यहां के छात्रों की भारी मौजूदगी इसकी साख का प्रमाण है.

इसकी स्थापना 1966 में मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के शासनकाल में हुई. इसका नाम शुरुआत में ‘आर्यमेहर यूनिवर्सिटी’ था, लेकिन 1979 की क्रांति के बाद इसका नाम बदलकर मजीद शरिफ-वाकेफी के नाम पर शरिफ यूनिवर्सिटी कर दिया गया.शरिफ यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है. इंजीनियरिंग स्ट्रीम के टॉप 1% छात्र ही शरीफ यूनिवर्सिटी में जगह बना पाते हैं.यहां मुकाबला इतना कड़ा है कि अक्सर टॉप 100 रैंक वाले छात्र ही अपनी पसंद की ब्रांच ले पाते हैं.

अमेरिका और यूरोप में बहुत मांग 

शरीफ यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट्स की मांग अमेरिका और यूरोप की टॉप यूनिवर्सिटीज जैसे स्टनफर्ड, एमआईटी और बर्कले में बहुत ज्यादा है. एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां के 80% से ज्यादा टॉप ग्रेजुएट्स बेहतर अवसरों और राजनीतिक माहौल की तलाश में देश छोड़ देते हैं. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व अध्यक्ष जॉन हेनेसी ने एक बार कहा था कि शरिफ यूनिवर्सिटी दुनिया के “बेहतरीन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग प्रोग्राम्स में एक” चलाती है.

महिलाओं की संख्या भी अच्छी खासी

यहां की प्रयोगशालाओं और क्लासरूम्स में महिलाओं की संख्या बहुत अधिक है, जो रोबोटिक्स, नैनो-टेक और एयरोस्पेस जैसे कठिन क्षेत्रों में रिसर्च कर रही हैं. ईरान नैनो-टेक में दुनिया के टॉप 5-10 देशों में आता है और इसका श्रेय शरिफ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स को जाता है. कड़े प्रतिबंधों के बावजूद यहां के छात्रों ने स्वदेशी सॉफ्टवेयर, सैटेलाइट तकनीक और मेडिकल डिवाइस विकसित किए हैं. तेहरान का अपना ‘सिलिकॉन वैली’ इसी यूनिवर्सिटी के आसपास विकसित हुआ है.

प्रदर्शनों में चर्चा में रही है ये यूनिवर्सिटी

2022 और हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान शरीफ यूनिवर्सिटी चर्चा में रही थी. यहां के छात्रों ने अभिव्यक्ति की आजादी के लिए बड़े प्रदर्शन किए, जिसके बाद कैंपस में सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी हुई. यह दिखाता है कि यह संस्थान केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि ईरान की बौद्धिक चेतना भी है.

शोध, बॉयोटेक्नोलॉजी और एआई में कहां

शोध के मामले में भी ईरान तेजी से आगे बढ़ा है. 2023 तक वैज्ञानिक प्रकाशनों की संख्या के मामले में ईरान दुनिया में 15वें स्थान पर पहुंच गया था, जबकि 1979 से पहले वह 39वें स्थान पर था. खास बात यह है कि नैनोटेक्नोलॉजी में तो ईरान और भी आगे है. 2024 में उसने इस क्षेत्र में 10,860 से अधिक शोध लेख प्रकाशित किए, जो दुनिया का छठा सबसे बड़ा योगदान है. बायोटेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भी ईरान का स्थान 13वां है.

प्रतिबंधों को अवसरों में बदला

शायद ईरानी इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण पैदा हुई चुनौतियों को अवसर में बदल दिया. पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरान को तकनीक आयात करने से रोक दिया. इसने ईरानी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती पेश की. साथ ही एक सुनहरा अवसर भी दिया कि वे खुद की तकनीक विकसित करें. उनके सामने स्वदेशीकरण के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा. इसी मजबूरी ने उन्हें दुनिया की कई उन्नत तकनीकों को खुद विकसित करने के लिए प्रेरित किया.

ईरान आज दुनिया के टॉप तीन देशों में शुमार है, जहां 1979 के बाद से लगभग 130 बांध बनाए जा चुके हैं. ईरान अपनी 95 प्रतिशत दवाइयां खुद बनाने में सक्षम है, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए एडवांस रीकॉम्बिनेंट दवाएं भी शामिल हैं. रक्षा क्षेत्र में भी ईरान ने 93 प्रतिशत आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है और ड्रोन तकनीक में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है.

ईरानी संस्कृति में गणित को बहुत सम्मान दिया जाता है. दुनिया की पहली महिला ‘फील्ड्स मेडल’ (गणित का नोबेल) विजेता, मरियम मिर्जाखानी ईरान से ही थीं. वहां का स्कूल सिस्टम स्टेम बहुत मजबूत आधार तैयार करता है.

सदियों से खास रही यहां की इंजीनियरिंग 

वैसे ईरान यानि प्राचीन पर्शिया की इंजीनियरिंग सदियों से खास रही क्योंकि उसके पास शुष्क जलवायु में पानी प्रबंधन की चुनौतियां थीं, जो कुदरती तौर पर इनोवेशन को जन्म देती रहीं. वैज्ञानिक परंपरा ने गणित, खगोल और यांत्रिकी को मजबूत किया. ईरान ने कुआनात सिस्टम विकसित किया, जो 2700 साल पुरानी भूमिगत जल प्रणाली है. आज भी 40,000 लोगों को पानी देती है. विंड कैचर्स और विंडमिल्स ने प्राकृतिक कूलिंग और ऊर्जा प्रदान की, जो आधुनिक एयर कंडीशनिंग का आधार बने.

इस्लामिक काल में बानू मूसा भाइयों ने बुक ऑफ इंजीनियस डिवासेज (Book of Ingenious Devices) लिखी, जिसमें ऑटोमेटा और यांत्रिक उपकरण के बारे में लिखा गया है. ख्वारिज्मी ने बीजगणित की नींव रखी, जो इंजीनियरिंग गणनाओं के लिए आधार बनी.

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