मनोरंजन » मुंबई की ‘परछाइयां’ में छिपा साहिर लुधियानवी का आशियाना, एक घर, अनगिनत गीतों की जन्मस्थली

मुंबई की ‘परछाइयां’ में छिपा साहिर लुधियानवी का आशियाना, एक घर, अनगिनत गीतों की जन्मस्थली

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नई दिल्ली. मुंबई लगातार चलती है, काम करती है. उसे यूं ही बैठना नामंजूर है पर जुहू में घूमते हुए लगता है कि यह मुंबई का हिस्सा होने पर भी कुछ अलग है. यहां के शांत माहौल में अरब सागर की बेचैन लहरों की आवाजें सुनी जा सकती हैं. इधर आप ढूंढ रहे हैं उस आशियाने को, जहां लंबे समय तक रहे साहिर लुधियानवी. आप सड़क पर आने-जाने वालों से उनके घर ‘परछाइयां’ का रास्ता पूछते हैं. सबका एक ही जवाब होता है- ‘पता नहीं.’ इससे ज्यादा कोई बताने को तैयार नहीं पर हमें जिद है ‘परछाइयां’ जाने की, उस घर की दीवारों को छूने की. इसलिए हम पैदल ही उसे तलाशते रहते हैं. जब हमने पूछना बंद किया तो यकीन मानिए, हम मंजिल पर पहुंच गए. अचानक हमारी नजर एक सलेटी रंग के बड़े बंगले की नेम प्लेट पर टिक गई. उस पर काले अक्षरों में रोमन में लिखा था ‘परछाइयां’.

1960 में साहिर साहब ने बनवाया था ‘परछाइयां’

‘परछाइयां’ में हमें नंदलाल मिलते हैं. करीब 70 वर्ष के होंगे. वे यहीं रहते हैं. उन्होंने साहिर साहब को यहां रहते देखा है. उन्हें याद है कि साहिर साहब के जन्मदिन (8 मार्च) पर बी.आर. चोपड़ा, देव आनंद, चेतन आनंद, आनंद बख्शी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल वगैरह आया करते थे. एकाध बार पंजाबी के कालजयी कवि शिव कुमार बटालवी भी आए थे. वे बताते हैं कि साहिर साहब ने 1960 के दशक में ‘परछाइयां’ बनवाया था. उस समय जुहू इतना चमक-दमक वाला इलाका नहीं बना था. साहिर साहब के पास इसकी ऊपरी दो मंजिलें थीं. उनमें उनका साथ उनकी मां रहती थीं. ‘परछाइयां’ में साहिर साहब के स्टडी रूम से अरब सागर नजर आता होगा. हालांकि अब उनके बंगले के आगे बहुत सारी इमारतें खड़ी हो गई हैं. उनका स्टडी ऐसा था, जहां रातें जागती थीं. समंदर की हवा बालकनी से आती और साहिर कागज पर झुके रहते. कभी-कभी कोई दोस्त, कोई संगीतकार, कोई फिल्मकार आ जाता. लिविंग रूम में बैठकर बातें होती- राजनीति की, कला की, सिनेमा की. कोई धुन गुनगुनाता, कोई फैज की कोई पंक्ति सुनाता और साहिर चुपचाप सुनते. फिर अचानक कोई पंक्ति कह देते, जो लगती जैसे सदियों से मौजूद थी.

जन्में यादगार गीत

‘परछाइयां’ में कई यादगार गीत जन्मे. कल्पना कीजिए एक रात का दृश्य-समंदर की हवा, बालकनी का दरवाजा खुला और साहिर डेस्क पर काम कर रहे हैं. शायद यहीं ‘प्यासा’ के लिए ‘जाने वो कैसे लोग थे’ की वो मार्मिक पंक्तियां लिखी गईं. वो गीत, जो एक घायल आदर्शवाद की आवाज बन गया. फिर ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ सफलता की चमक पर सवाल उठाने वाला वो गीत, जो आज भी सामाजिक अन्याय के खिलाफ एक तीखी ललकार है. साहिर की शायरी में विरोध था, लेकिन नफरत नहीं. वो सिस्टम से लड़ते थे, लेकिन इंसानियत को बचाना चाहते थे. उनकी नरमी भी कमाल की थी. ‘कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है’ कभी कभी’ फिल्म का वो गीत, जो प्यार को कोई जोरदार इजहार नहीं, बल्कि एक पुरानी याद की तरह पेश करता है. इस गीत की पंक्तियां धीरे-धीरे दिल में उतरती हैं, जैसे कोई पुरानी तस्वीर देखकर आंखें भीग जाती हैं.

अभी न जाओ छोड़कर…

और ‘हम दोनों’ फिल्म का ‘अभी न जाओ छोड़कर’ वो रोमांटिक गीत, जो प्रेमियों के बीच की झिझक को इतनी खूबसूरती से बयान करता है. ये गीत सिर्फ फिल्मों के लिए नहीं लिखे गए थे. ये कविताएं थीं, जो संगीत की मदद से लाखों दिलों तक पहुंचीं.

मां के साथ साहिर

‘परछाइयां’ सिर्फ लिखने की जगह नहीं थी. यह साहिर की जिंदगी का हिस्सा थी. साहिर कभी शादी नहीं की. उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा उनकी मां सरदार बेगम थीं. साहिर मां से बेहद मोहब्बत करते थे. घर में मेहमानों की बहस चल रही होती, अचानक साहिर उठते और मां के कमरे में जाकर पूछते, ‘आप क्या सोचती हैं?’ मां की राय उनके लिए दुनिया की तारीफ से ज्यादा मायने रखती थी. ‘परछाइयां’ के करीब एक सिंधी सज्जन माखीजानी मिले. वे बताने लगे कि साहिर साहब अपनी मां के साथ घर के नजदीक पार्क में सुबह टहलते थे. मुंबई में हरे-भरे बगीचे कम ही मिलते हैं, पर साहिर साहब के घर के बेहद नजदीक एक बगीचा है. डॉ. हरीश भल्ला, जो साहिर के गीतों पर जीवन भर शोध करते रहे, कहते थे कि 1976 में मां के जाने के बाद साहिर टूट गए. जैसे उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा चला गया. चार साल बाद, 25 अक्टूबर 1980 को मात्र 59 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हो गया. वे जुहू के मुस्लिम कब्रिस्तान में दफन हुए. नंदलाल ने उनकी शवयात्रा देखी थी. तब लगा था कि मानो सारा फिल्मी संसार ‘परछाइयां’ पहुंच गया था. शब्दों के शैदाई के असमय चले जाने से सब उदास थे.

पसरा सन्नाटा

साहिर के जाने के बाद ‘परछाइयां’ में सन्नाटा पसरने लगा. घर में वो संगीत, वो बहसें, वो किताबें सब धीरे-धीरे गायब हो गए. कोई साफ वसीयत नहीं थी, वारिसों में विवाद हुआ. लंबी कानूनी लड़ाई चली. मशहूर लाइब्रेरी बिखर गई. कुछ कागजात तो सालों बाद कबाड़ में मिले, जिन्हें प्रशंसकों ने बचाया. आज साहिर साहब का ‘परछाइयां’ वैसे ही खड़ा है. इसमें कुछ परिवार रहते हैं. घर की हालत देखकर लगता है कि इसमें सफेदी हुए एक जमाना गुजर चुका है. इसके आसपास शानदार घर खड़े हैं, उनके आगे मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी कारें खड़ी हैं. लेकिन साहिर के चाहने वालों के लिए यह जगह पवित्र-सी है. क्योंकि यहां अब भी साये बाकी हैं-रात के वक्त बालकनी पर टहलते शायर की परछाई.

लिखे अमर गीत

मुंबई में यादें जल्दी मिट जाती हैं. लेकिन ‘परछाइयां’ आज भी खड़ी है, जैसे कह रही हो यहां कभी शायरी जीती थी. शब्द जीते थे और जो शब्द सच्चे दिल से निकलें, वे दीवारों से भी ज्यादा मजबूत होते हैं. वे लाखों दिलों में बस जाते हैं और कभी नहीं मिटते. आप ‘परछाइयां’ की नेम प्लेट पर लिखे ‘परछाइयां’ को छूते हैं. आप सोचते हैं कि कितना खुशनसीब यह घर, जहां वो शख्स रहा करता था जिसने ‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम’ (हम दोनों, 1961), ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं’ (गुमराह, 1963), ‘मन रे तू काहे न धीर धरे’ (चित्रलेखा, 1963), ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ (कभी कभी, 1976), ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ (प्यासा, 1957) जैसे न जाने कितने अमर गीत लिखे.

एक दुनिया दिल्ली में भी

साहिर लुधियानवी की मुंबई और ‘परछाइयां’ से दूर दिल्ली में भी दुनिया थी. उनके दिल्ली में भी चाहने वालों की कोई कमी न थी और न है. वे देश के विभाजन के बाद लाहौर से पहले दिल्ली आए और यहां कुछ समय तक एक उर्दू पत्रिका में काम किया. यहां मन नहीं लगा तो वे मुंबई चले गए. पर वे दिल्ली के मशहूर शंकर-शाद मुशायरे में अपने कलाम पढ़ने आते रहे. जानने वाले जानते हैं कि वे 1950 के दशक से ही शंकर-शाद मुशायरों में आने लगे थे. इसमें साहिर लुधियानवी के साथ जां निसार अख़्तर, कैफ़ी आज़मी, फ़िराक़ गोरखपुरी वगैरह भी अपने कलाम पढ़कर समायीन की वाह-वाही हासिल करते थे.

तुम मुझे भूल भी जाओ तो…

साहिर लुधियानवी राजधानी में आते तो कुछ वक्त अमृता प्रीतम के साथ कनॉट प्लेस के एंबेसी या क्वालिटी रेस्तरां में गुजारते. उधर किसी कोने की टेबल पर बैठकर दोनों घंटों दुनिया-जहां की बातें करते. दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध थे. दोनों पाकिस्तान वाले हिस्से के पंजाब से विभाजन के बाद दिल्ली आए थे.

साहिर का अमृता प्रीतम के के-25, हौज खास वाले घर में बार-बार आना हुआ. यह घर केवल ईंटों और पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि विचारों, भावनाओं और रचनाओं का गवाह था, जो अमृता और उनके साथी कलाकारों ने वहां साझा किए. साहिर बार-बार आए. वे आते तो शानदार महफिलें होतीं, जिनमें कविता, कहानी के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर चर्चा होती. इनमें नामी-गिरामी साहित्यकार, कवि, शायर, चित्रकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल होते. सब साहिर साहब से मिलने के बेकरार होते.

हौज खास के घर को अमृता जी ने खुद सजाया-संवारा था. यह घर इमरोज की पेंटिंग्स और अमृता की नज्मों का गवाह था. यह घर कला का ख्वाबगाह था. साहिर और शिव कुमार बटालवी आते तो महफिल घर के टेरस पर आयोजित होती. कहते हैं कि अमृता जी की गुजारिश पर साहिर और शिव बटालवी अपनी ताजा रचनाएं पढ़ते. शिव ने यहां कई बार अपनी मशहूर रचना सुनाई-

मैंनू तेरा शबाब लै बैठा,
रंग गोरा गुलाब लै बैठा.
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए
मैंनू एहो हिसाब लै बैठा
चंगा हुंदा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब लै बैठा
दिल दा डर सी किते न लै बैठे
लै ही बैठा जनाब लै बैठा.

यह रचना साहिर साहब के भी दिल के बहुत करीब थी. अब अमृता प्रीतम का हौज खास का बंगला बिक चुका है. वहां नया घर बन गया है. पर इस बंगले से साहिर साहब से जुड़ी यादें जिंदा हैं. संयोग से साहिर साहब का बंगला ‘परछाइयां’ अभी मौजूद है. काश, इसके बाहर कोई शिला पट्ट लगवा दी जाए ताकि पता चल जाए कि इसका क्या संबंध रहा है साहिर साहब से.

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