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Vande Bharat Train Owner : रेलवे क्‍यों देता है वंदे भारत का किराया, हर साल जाते हैं करोड़ों रुपये, कौन है इस ट्रेन का असली मालिक

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Who is Owner of Vande Bharat Train : रेलवे ने देशभर में दर्जनों वंदे भारत ट्रेनें चलाई हैं और सभी बड़े शहरों को आपस में जोड़ने की कोशिश की जा रही है. लेकिन, क्‍या आपको पता है कि रेलवे हर साल इन ट्रेनों के लिए म…और पढ़ें

रेलवे क्‍यों देता है वंदे भारत का करोड़ रुपये किराया, कौन है इस ट्रेन का मालिकवंदे भारत ट्रेन के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये किराये के रूप में देती है.
नई दिल्‍ली. देश में आज दर्जनों वंदे भारत ट्रेनें दौड़ रही हैं. आधुनिक सुविधाओं से लैस इस सेमी हाई स्‍पीड ट्रेन ने भारतीय रेलवे की सूरत ही बदल दी है. अब तो रेलवे ने वंदे भारत की स्‍लीपर ट्रेनें चलानी भी शुरू कर दी हैं. लेकिन, क्‍या आपको पता है कि रेलवे इस ट्रेन के लिए हर साल करोड़ों रुपये का किराया चुकाती है. तो क्‍या इसका मतलब यह है कि वंदे भारत रेलवे की खुद की संपत्ति नहीं है. फिर इस ट्रेन का असली मालिक कौन है और अगर रेलवे ही इसकी असली मालिक है तो वह किराया क्‍यों चुकाती है.

देश के हर बडे़ शहरों को जोड़ने के लिए चलाई जा रही वंदे भारत ट्रेन अपनी तमाम खूबियों की वजह से यात्रियों को बहुत पसंद आ रही है. लेकिन, यह शायद ही किसी को पता होगा कि भारतीय रेलवे इस ट्रेन के लिए हर साल करोड़ों रुपये का किराया चुकाती है. ऐसे में आपके मन में भी यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर इन ट्रेनों असली मालिक कौन है, अगर रेलवे इसके लिए हर साल करोड़ों रुपये किराया देती है तो यह पैसा जाता किसको है. इन सभी पहेलियों को इस आर्टिकल में सुलझाने की कोशिश करते हैं.

कौन है वंदे भारत का असली मालिक
सबसे पहले इसी पर बात करते हैं कि आखिर वंदे भारत ट्रेन का असली मालिक कौन है. इसका सीधा और सरल जवाब है, रेलवे. जी हां, भारतीय रेलवे ही वंदे भारत ट्रेनों की असली मालिक है. मेक इन इंडिया जैसे अभियान के तहत इन ट्रेनों के कोच को चेन्‍नई और देश अन्‍य जगहों पर स्थित फैक्ट्रियों में बनाया गया है. भारतीय रेलवे अभी तक वंदे भारत ट्रेनों के लिए करीब 500 कोच का निर्माण कर चुका है. हर साल इसके दर्जनों कोच बनकर आते हैं, जिनका निर्यात भी दूसरे देशों में किया जाता है.

फिर रेलवे क्‍यों देता है किराया
अब आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि जब वंदे भारत की असली मालिक रेलवे हैं तो हर साल इसका किराया क्‍यों करोड़ों रुपये चुकाती है. इसका जवाब है कि इन ट्रेनों को बनाने में हर साल अरबों रुपये की लागत आती है. रेलवे के पास इसके लिए एकमुश्‍त पैसा नहीं होता है तो वह इन पैसों को बाजार से उधार लेती है. उधार लेने के लिए रेलवे ने अपनी अलग कंपनी भी बनाई है जिसका नाम है इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC). यह कंपनी बाजार से उधार लेत है और इन पैसों पर ब्‍याज भी लौटाती है. आईआरएफसी के जुटाए इन पैसों का इस्‍तेमाल रेलवे खुद करती है और उस पर सरकार यानी रेलवे की तरफ से ब्‍याज सहित रिटर्न दिया जाता है. यही कारण है कि हर साल रेलवे को वंदे भारत ट्रेन के लिए भी करोड़ों रुपये किराया चुकाना पड़ता है.

कहां इस्‍तेमाल होते हैं पैसे
आईआरएफसी के इन पैसों का इस्‍तेमाल रेलवे वंदे भारत सहित अन्‍य ट्रेनों के कोच बनाने में, पटरियां बिछाने सहित अन्‍य निर्माण कार्य में करता है. आईआरएफसी इन चीजों की फंडिंग करती है और फिर किराये पर रेलवे को दे देती है. इसके बदले में रेलवे हर साल उसे किराया के रूप में पैसे लौटाता है. इसका फायदा यह है कि रेलवे के ऊपर एकसाथ मोटे खर्चे का बोझ नहीं आता और वह इन्‍हीं ट्रेनों से कमाई करके वापस किराये के रूप में लौटा देती है. बस यह सारा काम आईआरएफसी के जरिये ही होता है, जिसे रेलवे किराये का पैसा देती है.

कितना पैसा हुआ है खर्च
आईआरएफसी को ब्‍याज और मूलधन लौटाने में रेलवे को हर साल हजारों करोड़ रुपये देने पड़ते हैं. वित्‍तवर्ष2023-24 में यह आंकड़ा 30,154 करोड़ रुपये था. इसमें से 17 हजार करोड़ से ज्‍यादा की रकम मूलधन के रूप में दी गई थी, जबकि 13 हजार करोड़ से ज्‍यादा की रकम ब्‍याज के रूप में चुकाई गई थी. इस अवधि तक रेलवे ने 2.95 लाख करोड़ रुपये की संपत्तियां किराये पर ले ली हैं, जिनके ब्‍याज और मूलधन के रूप में यह पैसे चुकाए गए. यह पैसे सिर्फ वंदे भारत ही नहीं, बल्कि करीब 13 हजार रेलवे इंजन और अन्‍य कोच के लिए भी चुकाए गए हैं.

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Pramod Kumar Tiwari

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि… और पढ़ें

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