नई दिल्ली (Delhi University MA Sanskrit Syllabus). दिल्ली यूनिवर्सिटी ने एमए संस्कृत कोर्स के तीसरे सेमेस्टर के सिलेबस में बड़ा बदलाव किया है. पहले जहां ‘मनुस्मृति’ को शामिल करने का प्रस्ताव था, वहीं अब इसे हटाकर ‘शुक्रनीति’ को जगह दी गई है. कुलपति योगेश सिंह ने आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह निर्णय लिया है. इसे 12 सितंबर 2025 को होने वाली कार्यकारी परिषद (Executive Council) की बैठक में पेश किया जाएगा.
मनुस्मृति को विवादास्पद ग्रंथ माना जाता है. इसमें वर्ण व्यवस्था और महिलाओं की स्थिति को लेकर कई ऐसे विचार हैं, जिन्हें आधुनिक समाज में अन्यायपूर्ण और अप्रासंगिक माना जाता है. जब जून 2025 में संस्कृत विभाग ने इसे सिलेबस में शामिल किया तो
दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को सफाई देनी पड़ी कि मनुस्मृति को किसी भी कोर्स में नहीं पढ़ाया जाएगा. अतीत में भी कानून और इतिहास जैसे विषयों में इसे जोड़ने की कोशिश हो चुकी थी लेकिन हर बार विरोध के चलते प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.
मनुस्मृति पर विवाद क्यों?
मनुस्मृति को प्राचीन धर्मशास्त्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसके कई प्रावधान जाति और स्त्रियों के अधिकारों को सीमित करते हैं. यही वजह है कि समय-समय पर छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और सामाजिक समूहों ने इसका विरोध किया है. आलोचकों का कहना है कि इसे पढ़ाने से पिछड़े और भेदभावपूर्ण विचारधाराओं को शैक्षणिक मान्यता मिल जाएगी. इसीलिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति को दोहराना पड़ा कि मनुस्मृति एमए संस्कृत सिलेबस का हिस्सा नहीं बनेगी.
अब शुक्रनीति है नया विकल्प
एमए के स्टूडेंट्स को थर्ड सेमेस्टर सिलेबस में मनुस्मृति की जगह अब ‘शुक्रनीति’ पढ़ाई जाएगी. यह ग्रंथ आचार्य शुक्राचार्य से जुड़ा माना जाता है. इसमें राज्य संचालन, समाज व्यवस्था, नैतिकता, राष्ट्र की अवधारणा और सैन्य रणनीति जैसे विषयों का अच्छा वर्णन बताया जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुसार यह पेपर एमए संस्कृत तीसरे सेमेस्टर के स्टूडेंट्स के लिए एक वैकल्पिक विषय (elective) होगा. वे चाहें तो इसे चुन सकते हैं और चाहें तो रिजेक्ट कर सकते हैं.
Difference Between Manusmriti and Shukraniti: मनुस्मृति और शुक्रनीति में 5 अंतर
शुक्रनीति विषय ऑप्ट करने से पहले उसे समझना जरूरी है. जानिए मनुस्मृति और शुक्रनीति के बीच 5 बड़े अंतर-
1. विषय-वस्तु और उद्देश्य
मनुस्मृति: इसका मुख्य फोकस धर्मशास्त्र, वर्ण व्यवस्था और सामाजिक आचार-विचार पर है. इसमें जाति, स्त्री-पुरुष की भूमिकाएं और धार्मिक नियमों के बारे में विस्तार से बताया गया है.
शुक्रनीति: इसका केंद्र शासन व्यवस्था, प्रशासन, रिसोर्स मैनेजमेंट, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति है. इसमें राजा और राज्य के कर्तव्यों पर फोकस किया गया है.
2. सोशल अप्रोच
मनुस्मृति: समाज को जातियों में बांटकर अलग-अलग कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या करती है. इसे आधुनिक काल में भेदभावपूर्ण माना जाता है.
शुक्रनीति: समाज को एकजुट रखने के लिए नैतिक आचरण और न्यायसंगत प्रशासन की बात करती है. जातिगत भेदभाव पर फोकस नहीं है.
3. महिलाओं की स्थिति
मनुस्मृति: महिलाओं को अधीनता और सीमित अधिकार देने वाली मानी जाती है. यही कारण है कि इसे सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ी.
शुक्रनीति: इसमें प्रशासन और शासन व्यवस्था पर चर्चा होती है, महिलाओं के अधिकारों या सामाजिक भूमिकाओं पर वैसा विवादित दृष्टिकोण नहीं मिलता.
4. शासन और राजनीति
मनुस्मृति: शासन व्यवस्था पर कम, धार्मिक और सामाजिक नियमों पर ज्यादा केंद्रित है.
शुक्रनीति: सीधे तौर पर राज्य संचालन, राजनैतिक नीतियों, युद्ध रणनीतिों और संसाधनों के सही उपयोग की शिक्षा देती है.
5. आधुनिक प्रासंगिकता
मनुस्मृति: आधुनिक लोकतांत्रिक और समानतावादी मूल्यों के साथ असंगत मानी जाती है.
शुक्रनीति: प्रशासनिक और नैतिक दृष्टिकोण से आज भी स्टडी के लिए उपयोगी मानी जा सकती है, खासकर पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और स्टेटक्राफ्ट की पढ़ाई में.