सुजाता के पति मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की पत्नी है. कुख्यात नक्सली और माओवादी पोलित ब्यूरो के सदस्य किशनजी को साल 2011 में मार गिराया गया था. जिंदगी की शुरुआत में सुजाता भी एक आम लड़की की तरह थी. किशोरावस्था में प्रवेश करते ही उसके सीने में भी ‘क्रांति’ की ज्वाला भड़कने लगी थी. सुजाता जब 12वीं कक्षा में थी, तब उसका रुझान मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा की तरफ बढ़ गया था. इसके बाद सुजाता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1982 में वह माओवादी मूवमेंट में शामिल हो गई थी. नक्सली संगठन में वह लगातार आगे बढ़ती गई और सेंट्रल कमेटी मेंबर तक पहुंच गई. सुजाता का नाम माओवादियों के टॉप लीडरशिप में शुमार हो गया.
सुजाता की कहानी न केवल व्यक्तिगत जीवन की उथल-पुथल का आईना है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह विचारधारा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्षपूर्ण परिस्थितियां किसी व्यक्ति को पूरी तरह बदल सकती हैं. गांव की एक छात्रा से माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य तक का उसका सफर एक लंबे आंदोलन की कहानी है.
पोस्टमास्टर पिता की बेटी
जोगुलंबा गडवाल जिले के पेंचिकलपाडु गांव की साधारण ग्रामीण युवती सुजाता ने अपने जीवन की दिशा उस समय बदल दी, जब उसने किशोरावस्था में ही माओवादी विचारधारा को अपना लिया. सुजाता के पिता थिम्मा रेड्डी गांव में ही पोस्टमास्टर थे और खेती-किसानी से भी जुड़े थे. वह कक्षा 12 में पढ़ते समय वह मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों से प्रभावित हुई और 1982 में भूमिगत होकर माओवादी मूवमेंट से जुड़ गई. सुजाता का परिवार लंबे समय से माओवादी मुहिम से जुड़ा रहा. उसका बड़ा भाई और दो चचेरे भाई संगठन में टॉप लीडरशिप तक पहुंचे. साल 1987 में सुजाता और उसके पति किशनजी को दंडकारण्य फॉरेस्ट कमेटी (गढ़चिरौली, महाराष्ट्र) भेजा गया. उसकी छोटी बेटी को संगठन के विश्वस्त कार्यकर्ता की देखरेख में सौंपा गया था. किशनजी को बाद में पश्चिम बंगाल भेजा गया. किशनजी 24 नवंबर 2011 को पश्चिम मेदिनीपुर जिले में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. सुजाता के परिवार के अन्य सदस्य भी इसी रास्ते पर अपनी जान गंवा बैठे. उनके दो चचेरे भाई और एक भाभी माओवादी गतिविधियों के दौरान पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए. किशनजी का भाई मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ अभय (जो पोलित ब्यूरो का सदस्य है) आज भी भूमिगत जीवन जी रहा है.
जिंदगी की शुरुआत में सुजाता भी एक आम लड़की की तरह थी. किशोरावस्था में प्रवेश करते ही उसके सीने में भी ‘क्रांति’ की ज्वाला भड़कने लगी थी. सुजाता जब 12वीं कक्षा में थी, तब उसका रुझान मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा की तरफ बढ़ गया था. इसके बाद सुजाता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1982 में वह माओवादी मूवमेंट में शामिल हो गई थी.
लीडरशिप में लगातार आगे बढ़ती गई
कमजोर हो रहा माओवदी मूवमेंट
सुरक्षा बलों का दावा है कि माओवादी संगठन अब अपना प्रभाव और जनाधार खो रहा है. बस्तर रेंज के आईजी पी. सुंदरराज ने शेष अंडरग्राउंड सदस्यों से हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने की अपील की. उन्होंने कहा, ‘माओवादी कैडर और उसका नेतृत्व अब किसी विकल्प की स्थिति में नहीं है. उन्हें हिंसा छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ना ही होगा.’ सुजाता की कहानी न केवल व्यक्तिगत जीवन की उथल-पुथल का आईना है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह विचारधारा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्षपूर्ण परिस्थितियां किसी व्यक्ति को पूरी तरह बदल सकती हैं. गांव की एक छात्रा से माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य तक का उनका सफर एक लंबे आंदोलन की कहानी है. आज जबकि माओवादी आंदोलन अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, सुजाता जैसे नेताओं की भूमिका और उनकी जीवन यात्रा एक बड़े प्रश्न को सामने रखती है: क्या यह सब संघर्ष वास्तव में उस बदलाव को ला पाया, जिसकी कल्पना कभी 1980 के दशक में की गई थी?





