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Assam Earthquake News: अफगा‍न‍िस्‍तान की तरह कांपा असम, लेकिन वहां मची तबाही, यहां कुछ भी नहीं हुआ,आखिर क्‍यों?

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नई दिल्ली. भूकंप की तीव्रता भले ही ज़्यादा मायने रखती हो, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि असर कितना होता है. ताज़ा उदाहरण असम और अफगानिस्तान का है. असम में जहां 5.8 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ, वहां किसी तरह की बड़ी तबाही की खबर नहीं आई. वहीं अफगानिस्तान में पिछले दिनों 6 तीव्रता के भूकंप ने ऐसी तबाही मचाई कि 2200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. सवाल उठता है कि जब दोनों जगह रिक्टर स्केल पर झटके लगभग बराबर थे, तो नतीजे इतने अलग क्यों रहे?

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रदेश में आए भूकंप को लेकर कहा, “असम में आज 5.6 तीव्रता का भूकंप आया. भूकंप का केंद्र उदलगुरी के पास था. अभी तक किसी बड़े नुकसान या जान-माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है. हम स्थिति पर लगातार नज़र रख रहे हैं.” असम और अफगानिस्तान के भूकंप को लेकर एक और बात है जो हैरान करती है. अफगानिस्तान में भूकंप का केंद्र धरती के 10 क‍िलोमीटर नीचे था, जबकि असम में इसी गहराई सिर्फ 5 किलोमीटर ही थी. इस लिहाज से देखें तो तबाही असम में ज्‍यादा मचनी चाह‍िए थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

असम का भूकंप – झटके तो आए, पर नुकसान नहीं
असम के कई हिस्सों में 14 सितंबर को शाम करीब 4 बजकर 41 मिनट पर 5.8 तीव्रता के झटके महसूस किए गए. लोग दहशत में घरों और दफ़्तरों से बाहर निकल आए. गुवाहाटी, तेज़पुर और डिब्रूगढ़ जैसे इलाकों में कंपन साफ़ महसूस हुआ. लेकिन राहत की बात यह रही कि न तो किसी इमारत के गिरने की खबर आई और न ही जान-माल का नुकसान हुआ.

स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग तुरंत सक्रिय हो गए और हालात पर नज़र रखी. विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वोत्तर भारत भूकंप संभावित इलाका है. यहां लोग पहले से सतर्क रहते हैं और इमारतों को भी काफी हद तक भूकंपरोधी मानकों के हिसाब से बनाया जाता है. यही वजह रही कि मध्यम तीव्रता का यह भूकंप सिर्फ डर तक ही सीमित रहा.

अफगानिस्तान का भूकंप : तबाही और हज़ारों मौतें
इसके उलट, अफगानिस्तान में 6 तीव्रता का भूकंप काल बनकर टूटा. पश्चिमी प्रांत में आए इस भूकंप ने गांव के गांव मलबे में बदल दिए. मिट्टी और पत्थर से बनीं हजारों कच्ची झोपड़ियां और घर कुछ ही सेकंड में ढह गए. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, अब तक 2200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों घायल हैं. कई गांवों में तो राहत दल भी देर से पहुंच पाए, जिससे हताहतों की संख्या और बढ़ गई. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने राहत कार्य शुरू किया है, लेकिन दूर-दराज़ के पहाड़ी इलाकों में पहुंचना बेहद मुश्किल हो रहा है. वहीं, अफगानिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता और संसाधनों की कमी ने इस आपदा को और भयावह बना दिया.

क्यों अलग रहा असर?
अब बड़ा सवाल यह है कि असम और अफगानिस्तान में आए लगभग समान तीव्रता वाले भूकंप का असर इतना अलग क्यों रहा.

भवन निर्माण और ढांचा
असम और पूर्वोत्तर भारत में इमारतें तुलनात्मक रूप से भूकंपरोधी डिज़ाइन पर खड़ी की जाती हैं. यहां पर भूकंप सुरक्षा मानकों का पालन अपेक्षाकृत बेहतर होता है. दूसरी तरफ, अफगानिस्तान में अधिकांश मकान मिट्टी और पत्थर से बने कच्चे ढांचे हैं. ये थोड़े से झटकों में भी ढह जाते हैं.

तैयारी और आपदा प्रबंधन
भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य स्तर पर SDRF जैसी टीमें हमेशा तैयार रहती हैं. झटकों के तुरंत बाद अलर्ट जारी हो जाता है. वहीं, अफगानिस्तान में दशकों से चले आ रहे संघर्ष और संसाधनों की कमी के कारण आपदा प्रबंधन तंत्र बेहद कमजोर है.

घनत्व और आबादी का असर
असम में भूकंप का केंद्र अपेक्षाकृत कम घनी आबादी वाले क्षेत्र में था. अफगानिस्तान का प्रभावित इलाका गांवों और कस्बों से घिरा था, जहां कच्चे घरों की भरमार थी. इससे तबाही कई गुना बढ़ गई.

भूगर्भीय स्थिति
असम भूकंप प्रवण ज़ोन में होने के बावजूद वहां जमीन की प्रकृति और इमारतों की मजबूती ने झटकों का असर कम किया. अफगानिस्तान के पहाड़ी और ढलान वाले इलाके भूस्खलन और मिट्टी धंसने की घटनाओं को और तेज़ कर देते हैं.

भारत का अनुभव क्यों काम आया?
भारत ने 2001 के गुजरात भूकंप, 2015 के नेपाल भूकंप और 2023 के जोशिमठ धंसाव जैसी आपदाओं से बहुत कुछ सीखा है. NDMA की गाइडलाइंस के मुताबिक नई इमारतों में भूकंपरोधी डिज़ाइन अनिवार्य किए गए हैं. स्कूलों, अस्पतालों और बड़े सरकारी भवनों पर विशेष ध्यान दिया जाता है. यही वजह है कि असम जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इस बार बड़े नुकसान से बच गए.

अफगानिस्तान के लिए सबक
अफगानिस्तान की तबाही बताती है कि प्राकृतिक आपदा का असली असर इमारतों और सिस्टम की मजबूती पर निर्भर करता है. अगर वहां आपदा प्रबंधन तंत्र और मजबूत निर्माण होता, तो इतने बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं होती. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी और संसाधनों की कमी ने वहां की त्रासदी को और विकराल बना दिया.

वैश्विक मदद की ज़रूरत
अफगानिस्तान में राहत और बचाव के लिए वैश्विक सहयोग की सख्त ज़रूरत है. संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस जैसी एजेंसियां मदद कर रही हैं, लेकिन हालात इतने गंभीर हैं कि केवल अंतरराष्ट्रीय साझेदारी ही वहां के लोगों को सहारा दे सकती है. वहीं, भारत जैसे देश पहले भी अफगानिस्तान की आपदा में मदद करते रहे हैं और भविष्य में भी ऐसा कर सकते हैं.

नतीजा : भूकंप सिर्फ प्रकृति नहीं, तैयारी की भी परीक्षा
असम और अफगानिस्तान के उदाहरण साफ दिखाते हैं कि भूकंप का असर केवल उसकी तीव्रता पर नहीं, बल्कि हमारी तैयारी और बुनियादी ढांचे पर भी निर्भर करता है. असम में 5.8 तीव्रता का भूकंप आया और लोग बिना किसी बड़े नुकसान के सुरक्षित रहे. वहीं, अफगानिस्तान में 6 तीव्रता का भूकंप 2200 से ज्यादा जानें ले गया. यानी, आपदा कहीं भी आ सकती है, लेकिन फर्क इस बात से पड़ता है कि हम उससे निपटने के लिए कितने तैयार हैं. यही तैयारी जान बचाती है और यही लापरवाही जान ले लेती है.

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