पीठ ने कहा, “बिहार एसआईआर में हमारा फैसला पूरे भारत में एसआईआर के लिए लागू होगा.” इसने स्पष्ट किया कि वह निर्वाचन आयोग को देश भर में मतदाता सूची में संशोधन के लिए इसी तरह की प्रक्रिया करने से नहीं रोक सकती. हालांकि, पीठ ने बिहार एसआईआर कवायद के खिलाफ याचिका दायर करने वालों को सात अक्टूबर को अखिल भारतीय एसआईआर पर भी दलील रखने की अनुमति दी. शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 30 सितंबर को अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन से मामले के निर्णय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने शुरू में पीठ से अनुरोध किया कि न्यायालय को एसआईआर प्रक्रिया का अंतिम मूल्यांकन होने तक सुनवाई स्थगित कर देनी चाहिए. गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि निर्वाचन आयोग अन्य राज्यों में भी एसआईआर कवायद कराने की तैयारी कर रहा है.
कुछ कार्यकर्ताओं की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि किसी को भी अवैध कार्यप्रणाली के कारण मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. पीठ ने कहा, “कृपया इसे हमसे लें. यदि हमें बिहार में एसआईआर के किसी भी चरण में ईसीआई द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली में कोई अवैधता मिलती है, तो पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया जाएगा.” कांग्रेस सहित कई विपक्षी राजनीतिक दलों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने अदालत से अनुरोध किया कि इस मामले पर जल्द से जल्द सुनवाई की जाए, क्योंकि निर्वाचन आयोग ने पूरे देश में एसआईआर कवायद की घोषणा की है.
अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि उन्होंने आठ सितंबर के आदेश को वापस लेने का अनुरोध करते हुए एक अंतरिम आवेदन दायर किया है, जिसमें कहा गया था कि एसआईआर प्रक्रिया के लिए आधार कार्ड को 12वां दस्तावेज माना जाए. उन्होंने कहा, “अदालत के छह फैसले हैं, जो कहते हैं कि आधार उम्र, निवास या नागरिकता का प्रमाण नहीं है. इसलिए, आधार को उन 11 दस्तावेजों के बराबर नहीं माना जा सकता; अन्यथा पूरी एसआईआर प्रक्रिया विनाशकारी होगी.” उन्होंने कहा कि कानून के तहत विदेशियों को भी आधार दिया जा सकता है और यह ग्राम प्रधान, स्थानीय विधायक या सांसद के अनुशंसा पत्र पर बनाया जा सकता है.
निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाना है, तथा उन लोगों के नामों को हटाना है जो मर चुके हैं, जिनके पास डुप्लीकेट मतदाता पहचान पत्र हैं या जो अवैध प्रवासी हैं. एसआईआर के निष्कर्षों से बिहार में पंजीकृत मतदाताओं की कुल संख्या घटकर 7.24 करोड़ हो गई, जो इस प्रक्रिया से पहले 7.9 करोड़ थी.





