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नरेंद्र मोदी का 75वां जन्मदिन: ‘मन की बात’ और संवाद की शक्ति | – News in Hindi

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आशीष कुमार अंशु

17 सितंबर 2025 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन का देश स्वागत करेगा. गुजरात के वडनगर में एक साधारण परिवार में जन्मे मोदीजी का जीवन चाय की दुकान से शुरू हुआ. उन्होंने असाधारण मेहनत और समर्पण से विश्व पटल पर भारत का परचम लहराया. चाय बेचने वाले बालक से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री तक का उनका सफर प्रेरणा का प्रतीक है. यह अवसर न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष और नेतृत्व का उत्सव है, बल्कि उस संवाद शक्ति का भी, जिसने उन्हें जन-जन का नेता बनाया. इस संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम है ‘मन की बात’, एक ऐसा रेडियो कार्यक्रम जो 3 अक्टूबर 2014 को विजयादशमी के दिन शुरू हुआ और आज देश के कोने-कोने में अनसुनी प्रतिभाओं को मंच दे चुका है.

एक प्रेरक जीवन का उत्सव

नरेंद्र मोदी का 75वां जन्मदिन केवल एक व्यक्तिगत पर्व नहीं, बल्कि एक ऐसे नेतृत्व का उत्सव है, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी. 1950 में जन्मे मोदी जी का जीवन सादगी, संघर्ष और सेवा का प्रतीक है. वडनगर की गलियों से लेकर विश्व मंच तक, उन्होंने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र अपनाया. उनके जन्मदिन पर, हम उन प्रतिभाओं को याद करते हैं, जिन्हें ‘मन की बात’ ने समाज के केंद्र में लाया. ये प्रतिभाएं-चाहे बिहार की साधना देवी हों, जो जैविक खेती के जरिए महिलाओं को सशक्त कर रही हैं, या कटक के चाय विक्रेता डी. प्रकाश राव, जिन्होंने स्वच्छता को मिशन बनाया-मोदी जी के उस दृष्टिकोण को जीवंत करती हैं, जो हर भारतीय को अवसर देना चाहता है.

मन की बात’: अनसुनी आवाजों का मंच

‘मन की बात’ की शुरुआत एक साधारण रेडियो प्रसारण के रूप में हुई, लेकिन यह जल्द ही सामाजिक परिवर्तन का वाहक बन गया. आकाशवाणी, दूरदर्शन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम 2025 तक 120 से अधिक एपिसोड पूरे कर चुका है. मायगव पोर्टल के जरिए लाखों सुझाव और 1.43 लाख ऑडियो रिकॉर्डिंग्स प्राप्त होने का आंकड़ा इसकी जनभागीदारी को दर्शाता है. 2017 के आकाशवाणी सर्वे के अनुसार, 66.7 प्रतिशत शहरी और 60 प्रतिशत ग्रामीण श्रोताओं ने इसे उपयोगी पाया. बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में इसकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, जहां रेडियो अभी भी सूचना का प्रमुख साधन है.

इस कार्यक्रम ने उन प्रतिभाओं को तलाशा, जो समाज की परिधि पर थीं. उदाहरण के लिए, बिहार की साधना देवी ने स्थानीय संसाधनों से जैविक खेती पर आधारित स्टार्टअप शुरू किया. ‘मन की बात’ में उनकी कहानी के उल्लेख के बाद, उन्हें सरकारी सहायता मिली, और आज उनका उद्यम सैकड़ों महिलाओं को रोजगार दे रहा है. इसी तरह, ओडिशा के डी. प्रकाश राव ने स्वच्छता अभियान को अपनाया, और कार्यक्रम में उनके जिक्र ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई. झांसी की रीता यादव ने वर्षा जल संचयन की तकनीक विकसित की, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया. यह मॉडल अब सैकड़ों गांवों में जल स्तर सुधार का आधार बना.

वैश्विक स्तर पर भी इस कार्यक्रम ने प्रभाव छोड़ा. थाईलैंड में रहने वाले भारतीय मूल के डॉ. चिरापत प्रपंडविद्या ने संथाली भाषा को डिजिटल मंच पर संरक्षित किया. ‘मन की बात’ में उनकी कहानी ने आदिवासी सांस्कृतिक धरोहर को नई पहचान दी. इसी तरह, थाईलैंड की डॉ. कुसुमा रक्षामणि ने संस्कृत के प्रचार को बढ़ावा दिया, जिसे कार्यक्रम ने वैश्विक मंच प्रदान किया. ये उदाहरण साबित करते हैं कि ‘मन की बात’ केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि यह प्रवासी भारतीयों को भी जोड़ता है.

सामाजिक प्रभाव: एक क्रांति का सूत्रपात

‘मन की बात’ का प्रभाव केवल व्यक्तिगत कहानियों तक सीमित नहीं; यह सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन का वाहक है. पहले एपिसोड में खादी को बढ़ावा देने की अपील से इसकी बिक्री में 120 प्रतिशत की वृद्धि हुई. स्वच्छता अभियान पर चर्चा ने ग्रामीण भारत में स्वच्छता कवरेज को 100 प्रतिशत के करीब पहुंचाया. जल संरक्षण पर जोर से, झांसी जैसे क्षेत्रों में जल स्तर में 20-30 प्रतिशत सुधार हुआ. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अनुसार, 99 एपिसोडों में कृषि पर चर्चा ने उद्यमिता को बढ़ावा दिया, जिससे कृषि-स्टार्टअप्स में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई. उदाहरण के लिए, गुजरात के एक युवा किसान का जैविक खाद स्टार्टअप राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुका है. कोविड-19 के दौरान, टीकाकरण को प्रोत्साहन देने में भी यह कार्यक्रम प्रभावी रहा. वैश्विक स्तर पर, 100 से अधिक देशों में इसका प्रसारण भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है.

मन की बात’ क्यों है कार्यकाल की उपलब्धि?

‘मन की बात’ को मोदी जी के कार्यकाल की उपलब्धि इसलिए माना जाता है, क्योंकि यह लोकतंत्र को जीवंत करता है. यह जनता को शासन का हिस्सा बनाता है, जो भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना है. मायगव पोर्टल के जरिए प्राप्त लाखों सुझाव इसकी समावेशिता का प्रमाण हैं. यह कार्यक्रम सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों को एक मंच पर लाता है, जो नीति निर्माण को प्रभावित करता है. नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, बहुआयामी गरीबी (एक ऐसी स्थिति है जहाँ एक व्यक्ति न केवल आय की कमी महसूस करता है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के अन्य प्रमुख कारकों में भी वंचित होता है. इसका आकलन बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (MPI) के माध्यम से किया जाता है) से 25 करोड़ लोग बाहर आए, जिसमें सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में ‘मन की बात’ की भूमिका अहम रही. यह न केवल व्यक्तियों को प्रेरित करता है, बल्कि सामुदायिक कार्रवाई को गति देता है. उदाहरण के लिए, बिहार की एक महिला ने मधुमक्खी पालन शुरू किया, जिससे उनकी आय दोगुनी हुई. यह कार्यक्रम ग्रामीण और शहरी भारत को जोड़ता है, क्योंकि रेडियो की पहुंच 90 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक है.

मोदी जी का संवाद-केंद्रित नेतृत्व उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता है. विश्व नेताओं जैसे रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने उनकी ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति की सराहना की, जो संवाद की शक्ति से प्रेरित है. ‘मन की बात’ ने यह सिद्ध किया कि एक प्रधानमंत्री न केवल नीतियों, बल्कि शब्दों से भी समाज को बदल सकता है. यह उनके कार्यकाल की उपलब्धि है, क्योंकि यह भारत के हर कोने को जोड़ता है.

परीक्षा पर चर्चा’: युवाओं का मार्गदर्शन

‘मन की बात’ के साथ-साथ, ‘परीक्षा पर चर्चा’ ने भी सामाजिक स्वीकार्यता हासिल की है. 2018 में शुरू हुआ यह वार्षिक आयोजन छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को परीक्षा के तनाव से निपटने के लिए प्रेरित करता है. 2025 के संस्करण में 3.3 करोड़ से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जो इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है. ‘एग्जाम वॉरियर्स’ पुस्तक के जरिए मोदी जी ने तनाव प्रबंधन के सूत्र दिए. 2024 के संस्करण में, उन्होंने कहा, “रील देखने में समय बर्बाद न करें, पर्याप्त नींद लें,” जो युवाओं में गूंजा. आरटीआई डेटा के अनुसार, इस कार्यक्रम पर 40 करोड़ से अधिक खर्च हुआ, लेकिन इसके प्रभाव ने इसे सार्थक बनाया. सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज और छात्रों के सकारात्मक फीडबैक से पता चलता है कि 80 प्रतिशत से अधिक छात्र इसे उपयोगी मानते हैं. हालांकि, एनसीआरबी के 2022 के आंकड़े (13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याएं) चिंता का विषय हैं, पर ‘परीक्षा पर चर्चा’ ने मानसिक स्वास्थ्य को मुख्यधारा में लाकर जागरूकता बढ़ाई. यह कार्यक्रम परीक्षा को बोझ नहीं, अवसर के रूप में स्थापित करता है.

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