सबसे पहले जानते हैं कि डिफेंस डील क्या है. पाकिस्तान और सऊदी अरब ने बुधवार को डिफेंस डील की है. इस रक्षा समझौते के तहत दोनों में से किसी एक देश पर आक्रमण को दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यह समझौता न केवल संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है. बयान में कहा गया कि यह समझौता अपनी सुरक्षा बढ़ाने, क्षेत्र और दुनिया में सुरक्षा और शांति प्राप्त करने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इसका मकसद दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के पहलुओं को विकसित करना और किसी भी आक्रामकता के खिलाफ संयुक्त प्रतिरोध को मजबूत करना है. समझौते में कहा गया है कि किसी भी देश के खिलाफ कोई भी आक्रामकता दोनों के खिलाफ आक्रामकता मानी जाएगी.
दरअसल, यह समझौता ठीक वैसे ही है, जैसे नाटो देश के बीच डील है. नाटो देश भी युद्ध और आक्रमण की स्थिति में एक-दूसरे को सुरक्षा देते हैं. भारत और रूस के बीच भी इंदिरा गांधी के वक्त ऐसी ही डील हुई थी. बहरहाल, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने एक बड़ा फैसला लिया था. भारत ने साफ कर दिया था कि अगर सीमा पार से आतंकी हमला होता है तो इसे युद्ध माना जाएगा. जी हां, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के वक्त मई में कहा था कि अगर पाकिस्तान समर्थिक आतंकी हमला होता है तो भारत इसे एक्ट ऑफ वॉर मानेगा यानी युद्ध की कार्रवाई. ऐसे में पाकिस्तान की यह डील बताती है कि वह भारत से पूरी तरह खौफजदा है. उसी आलोक में इसने यह डील की है.
अब सवाल है कि क्या भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब भी कूदेगा? अगर इस डील को देखें तो पहला जवाब हां ही होता है. डिफेंस डील में यह स्पष्ट है कि अगर पाकिस्तान पर हमला होता है तो सऊदी अरब उसका साथ देगा और अगर सऊदी अरब पर हमला होता है तो पाकिस्तान उसका साथ देगा. इसलिए अगर फ्यूचर में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो यह तय है कि सऊदी अरब भी पाकिस्तान की ओर से जंग में कूदेगा. इस डील की मजबूरी होगी कि सऊदी अरब आसिम मुनीर का साथ देगा. भारत पहले ही कह चुका है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है. अगर फिर से ऑपरेशन सिंदूर मई की तरह जोर-शोर से चलता है तो यह तय है कि सऊदी भी पाकिस्तान का साथ देगा. हालांकि, सऊदी अरब का भारत से जो संबंध रहा है, उसे देखते हुए अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच डिफेंस डील पर भारत सरकार की पूरी नजर है. भारत में विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस पूरे मामले पर कहा, ‘हमने सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर की खबरें देखी हैं. सरकार को इस बात की जानकारी थी कि यह घटनाक्रम, जो दोनों देशों के बीच एक दीर्घकालिक समझौते को औपचारिक रूप देता है, विचाराधीन था. हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर इस घटनाक्रम के प्रभावों का अध्ययन करेंगे. सरकार भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा और सभी क्षेत्रों में व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.’
दरअसल, पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों देशों के बीच यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब हाल ही में इजरायल ने कतर में हमास नेताओं को निशाना बनाया था. इस घटना ने खाड़ी देशों में असुरक्षा की भावना को गहरा कर दिया है, खासकर उन देशों में जो दशकों से अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहे हैं. इसलिए सऊदी अरब की यह मजबूरी है कि उसे पाकिस्तान के साथ जाना पड़ा. दूसरी मजबूरी यह है कि पाकिस्तान न्यूक्लियर ताकत है. सऊदी अरब के पास परमाणु हथियार नहीं है. वहीं पाकिस्तान की मजबूरी है कि वह सऊदी जैसे तेल रईस देश से अपना संबंध बेहतर रखना चाहता है. वह भारत और सऊदी के रिश्तों से वाकिफ है. फ्यूचर में ऑपरेशन सिंदूर की मार से बचने के लिए उसने यह डील की है.





