नाटो जैसे सैन्य गठबंधन की कल्पना इस आधार पर की गई थी कि उसके सदस्य देश किसी बाहरी खतरे के खिलाफ एक-दूसरे की रक्षा करेंगे. लेकिन अगर खतरा बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से आए तो क्या होगा? आज डेनमार्क इसी असहज सवाल से जूझ रहा है, जब उसका सबसे ताकतवर सहयोगी अमेरिका ही सैन्य आक्रमण करके ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात कर रहा है.
50 साल पहले क्या हुआ था?
ग्रीस ने छिड़का नमक
आज वही तर्क डेनमार्क के खिलाफ खड़ा नजर आ रहा है. पूर्व ग्रीक वित्त मंत्री यानिस वरुफाकिस ने सोशल मीडिया पर तीखा तंज कसते हुए लिखा कि नाटो बाहरी दुश्मनों से तो रक्षा करता है, लेकिन अपने ही सदस्यों से नहीं… चाहे वह तुर्की हो या अब अमेरिका. यानी डेनमार्क अब उसी क्लब में आ गया है, जिसकी शर्तें उसने कभी खुद तय करने में भूमिका निभाई थी.
नाटो का अनुच्छेद 5 कहता है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, लेकिन यह स्पष्ट रूप से बाहरी हमलों की बात करता है. अगर हमला भीतर से हो यानी नाटो का एक सदस्य ही दूसरे सदस्य पर हमला करे और वह भी अमेरिका जैसे सबसे ताकतवर देश… तो नाटो का चार्टर खामोश है. यही वजह है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को बलपूर्वक कब्जाने की कोशिश करता है, तो नाटो की सामूहिक रक्षा व्यवस्था कागजों तक सिमट सकती है.
डेनमार्क के साथ खड़े यूरोपीय देश
यूरोप के कई देशों ने प्रतीकात्मक रूप से डेनमार्क का समर्थन किया है. ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे देशों ने कुछ सैनिक भेजे भी हैं, लेकिन यह समर्थन सैन्य से ज्यादा राजनीतिक संदेश है. ट्रंप इस समर्थन से नाराज बताए जा रहे हैं और उन्होंने डेनमार्क के पक्ष में खड़े यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान भी किया है. इससे साफ है कि मामला सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं, बल्कि नाटो की एकजुटता और भविष्य का है.
ग्रीस-तुर्की विवाद ने नाटो को कमजोर तो किया था, लेकिन गठबंधन किसी तरह बच गया. आज हालात ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि इस बार विवाद में अमेरिका खुद शामिल है. यही देश नाटो की रीढ़ माना जाता है. स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ तक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर हमला किया, तो यह नाटो के लिए ‘डेथ नेल’ साबित हो सकता है.
क्या चाहते हैं ग्रीनलैंड के लोग?
ग्रीनलैंड की आबादी मुख्य रूप से इनुइट समुदाय से है. वे अपने भविष्य पर खुद फैसला चाहती है. इस रक्षा और विदेश नीति फिलहाल डेनमार्क के हाथ में है. यूरोपीय संघ डेनमार्क के साथ खड़ा है, लेकिन नाटो के पास इस संकट से निपटने का कोई स्पष्ट नियम नहीं है. नाटो प्रमुख मार्क रुटे की चुप्पी भी इसी असहज स्थिति को दर्शाती है.
1974 में जब नाटो ने ग्रीस को उसके साथी से नहीं बचाया, तब डेनमार्क जैसे देशों ने इसे सही ठहराया था. आज वही दलील डेनमार्क के सामने दीवार बनकर खड़ी है. शायद यही वजह है कि कोपेनहेगन में बैठे नीति-निर्माताओं को 50 साल पुराना वह रुख अब ‘दगाबाजी’ जैसा महसूस हो रहा होगा, क्योंकि नाटो में जब दोस्त दुश्मन बन जाए, तो आप सचमुच अकेले रह जाते हैं.





