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Death Anniversary Of Lenin: आज यानि 21 जनवरी को सोवियत संघ के संस्थापक और रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन की मृत्यु हो गई थी. वर्ष 1924 में गंभीर स्ट्रोक की वजह से उनकी मृत्यु हुई. लेकिन उससे भी ज्यादा हैरानी की बात है कि 102 सालों से रूस में रखा हुआ उनका शव. जिसको आज भी खास तरीके से महफूज रखा गया है. पहले तो उनके अंतिम संस्कार की बात हुई थी लेकिन फिर ये नहीं हो सका. जानिए सबकुछ

21 जनवरी 1924 को लेनिन की मृत्यु हो गई. हालांकि निधन से 6 साल पहले से ही उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था. 1918 में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ, जिसमें वो बच तो गए लेकिन स्वास्थ्य पर इसका गंभीर असर पड़ा. उस हमले में उन्हें दो गोलियां लगी थीं, जिनमें से एक उनकी गर्दन में काफी समय तक फंसी रही. इससे उन्हें सिरदर्द और अनिद्रा जैसी समस्याएं रहने लगीं.

लेनिन को मृत्यु से पहले कुल चार बड़े स्ट्रोक आए. पहला स्ट्रोक मई 1922 में आया, जिससे शरीर का दाहिना हिस्सा अस्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गया. दूसरा स्ट्रोक दिसंबर 1922 में आया, इससे उनकी हालत और बिगड़ गई. उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली. तीसरा स्ट्रोक मार्च 1923 में आया. इसके बाद वह बोलने की शक्ति खो बैठे. पूरी तरह बिस्तर पर आ गए. चौथा और अंतिम स्ट्रोक 21 जनवरी 1924 को शाम को आया, जिसके चलते केवल 53 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

उनका शव 102 सालों से मास्को में रखा है. आजतक उसका अंतिम संस्कार नहीं हुआ. हालांकि अक्सर उनके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार की बात होती रहती है. उनका शव रूस की राजधानी मास्को के लेनिनग्राद की एक बड़ी सी इमारत में सुरक्षित रखा हुआ है. रोज सैकड़ों, हजारों लोग लाइन लगाकर इसके दर्शन करते हैं. आखिर क्या वजह है कि 102 सालों से उनका शव अब भी मास्को में रखा है.
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लेनिन रूस में कम्युनिस्ट क्रांति के अगुवा थे. फिर क्रांति के बाद उन्होंने सोवियत संघ की स्थापना की. उनके निधन के बाद से कई पीढियां गुजर चुकी हैं. सोवियत संघ कई देशों में टूट चुका है. रूस में भी पिछले दशकों में काफी उथल-पुथल हो चुकी है लेकिन अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है लेनिन का शव. जिसको कड़ी सुरक्षा के बीच रखा गया है. दिन रात इसकी सुरक्षा रहती है. इसे सुरक्षित रखने का काम खास तरीके से लगातार किया जाता है. रूसी वैज्ञानिकों ने खास तकनीक से इस शव को इतने सालों से रखा है.

जिस जगह लेनिनग्राद में लेनिन का शव रखा गया है, उसे लेनिन म्युजोलियम कहा जाता है. ये मास्को के रेड स्क्वेयर पर है. ये शव मंद रोशनी वाले क्रिस्टल ताबूत में रखा है. वैसे अब ज्यादातर रूसी और रूस का चर्च चाहता है कि लेनिन के शव को दफना देना चाहिए.

कहा जाता मास्को में एक इंस्टीट्यूट है, जिसके वैज्ञानिक लंबे समय से बॉयो केमिकल तरीके से इस शव को सुरक्षित करने का काम कर रहे हैं. 5 से 6 एक्सपर्ट्स का कोर ग्रुप लेनिन के शव को ठीक कंडीशन में रखने में लगा रहता है. इसमें बॉयोकेमिस्ट और सर्जन के साथ एनटोमिस्ट यानि शरीर की आतंरिक संरचना के विशेषज्ञ शामिल हैं, इन्हें म्युजोलियम ग्रुप कहा जाता है. इन्हीं पर लेनिन की डेड बॉडी को ठीक हालत में रखने की जिम्मेदारी है. ये विशेषज्ञ दुनिया में तीन और बड़े नेताओं के पार्थिव शरीर को प्रिजर्व करने में सलाह देने का काम करते हैं. अन्य नेता हैं वियतनाम के हो चि मिन्ह, उत्तर कोरिया के राष्ट्रपिता किम द्वितीय और किम जोंग इल.

ये तकनीक सुनिश्चित करती हैं कि संरक्षित शव की फिजिकल फॉर्म बेहतर रहे, उसका लुक, आकार, वजन, रंग और अंगों की फ्लैक्सिबिलिटी और मुलायमित बनी रहे. इस काम में क्वासीबॉयोलॉजिकल साइंस का इस्तेमाल करते हैं. ये शव लेपन तरीकों से अलग है. इसमें वो कई बार कुछ हिस्सों की त्वचा प्लास्टिक या अन्य पदार्थों से बदल भी देते हैं. जिससे शव पुराने समय की तुलना में बदलता रहता है. ये पुरानी ममीकरण के तरीकों से अलग है, जिसमें शरीर पर एक बार लेपन करके छोड़ देते थे. डेड बॉडी समय के साथ रंग बदलती रहती थी.

जब जनवरी 1924 में लेनिन का देहांत हुआ तब सोवियत संघ के सभी नेताओं ने उनकी बॉडी को एक तय समय के बाद संरक्षित करने का विरोध किया था. वो ये भी नहीं चाहते थे कि इसे लोगों के प्रदर्शन के लिए रखा जाए. लेकिन जब दो महीने तक लोगों की भीड़ लेनिन के पार्थिव शरीर को देखने के लिए रेड स्क्वेयर पर उमड़ती रही, तब सोवियत नेताओं को उनके पार्थिव शरीर को लंबे समय तक संरक्षित करने का फैसला करना पड़ा.

तब उन्होंने इसे संरक्षित करने के लिए दो रूसी शरीर संरचना विशेषज्ञों व्लादीमीर वोरोबीव और बॉयोकेमिस्ट बोरिस जबरस्की को चुना. पहली बार डेड बॉडी में जो लेपन किया गया वो मार्च से लेकर जुलाई 1924 तक टिका रहा.डॉक्टरों ने लेनिन के पार्थिव शरीर की जब आटोप्सी की. कई नसें और रक्त नासिकाएं काट दी गईं. अगर ऐसा नहीं होता तो शरीर का आंतरिक प्रवाह सिस्टम बना रहता.

उसके बाद लेनिन लैब के रिसचर्स ने माइक्रो इंजेक्शन तकनीक विकसित की, जिसकी एक खुराक से एक खास द्रव शरीर के तय अंगों तक बहने लगता है, खासकर उन जगहों तक जहां आंतरिक तौर पर काटपीट हो चुकी है. लेनिन के शरीर के ऊपर बहुत पतले रबर का एक सूट तैयार किया गया, जो पब्लिक डिस्प्ले के दौरान वो हमेशा पहने रहते हैं. अब इस पार्थिव शरीर का लेपन साल में एक ही बार होता है. तब इसे कई प्रक्रियाओं से गुजरना होता है. हर प्रक्रिया आधे से एक महीना लेती है.

जिस प्रक्रिया में लेनिन के शव की देखरेख होती है. उनकी त्वचा में बदलाव किया जाता है, उससे उसकी चमक या ताजगी कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है. रूस बहुत मोटी रकम इसे सुरक्षित रखने पर हर साल खर्च करता है. वैसे क्या आपको मालूम है कि अगर लेनिन जिंदा होते तो कितने साल के होते. 155 सालों के. लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 के दिन रूस के सिंबरिक्स में हुआ था.

ये भी कहा जाता है कि लेनिन को संरक्षित करने के लिए जिम्मेदार लोग हर दो साल में उनके शरीर को रूसी औषधीय और सुगंधित पौधों के अनुसंधान संस्थान में एक टब में एक विशेष मिश्रण में भी रखते हैं.

लेनिन की मृत्यु इसी महलनुमा इमारत के उनके छोटे से कमरे में बिस्तर पर हुई. उस कमरे में बाकी सब कुछ वैसा ही है जैसा उनकी मृत्यु के समय था. इमारत की सभी घड़ियां, उसी तरह शाम 6.50 बजे पर रहती हैं. लेनिन को दिल का दौरा पड़ा था लेकिन 53 साल की उम्र में उनकी इतनी जल्दी मृत्यु क्यों हुई, ये पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है. (फोटो एपी)

स्तालिन के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लियोन ट्रॉट्स्की ने 1940 में एक लेख में सीधे तौर पर दावा किया था कि स्तालिन ने लेनिन को जहर दिया था. ट्रॉट्स्की के अनुसार, जब लेनिन बहुत बीमार थे. अपनी स्थिति से परेशान थे, तो उन्होंने स्तालिन से उन्हें जहर देने का अनुरोध किया था ताकि उनकी पीड़ा समाप्त हो सके. स्तालिन ने शायद इसी का फायदा उठाकर उन्हें मार दिया.





