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खामनेई का क्यों नहीं अब तक अंतिम संस्कार, इस्लाम में कैसे और कब होना चाहिए सुपुर्द ए खाक

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अगर शिया मुस्लिमों की सुपुर्द ए खाक की परंपरा और रीतिरिवाजों को देखें तो वहां ये रिवाज होता है कि निधन के एक घंटे के अंदर या फिर जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए. ऐसे में ये सवाल लाजिमी है कि ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई का निधन 28 फरवरी को हो जाने के बाद 13 दिनों बाद भी उन्हें अब तक सुपुर्द ए खाक क्यों नहीं किया गया.

खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमले में मौत हो गई थी. उनके अंतिम संस्कार को सुरक्षा कारणों से लगातार टाला जा रहा है, क्योंकि उनका जनाजा काफी बड़ा होगा, जिस पर हमले की आशंका है.

पहले अयातुल्लाह के जनाजे में 1 करोड़ लोग थे

जब ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी का जनाजा 1989 में निकला था तो उसमें करीब 1 करोड़ लोग शामिल हुए थे. इसे आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा जनाजा माना जाता है, ये उस समय की ईरान की आबादी का करीब 1/6 हिस्सा था. इतनी बड़ी भीड़ के कारण शव यात्रा के दौरान भगदड़ भी मच गई थी. इसी वजह से ये भी माना जा रहा है कि खुमैनी की जनाजे में भी बड़े पैमाने पर भीड़ उमड़ेगी. इसी वजह से इसे अभी टाला जा रहा है. खामनेई के शव को गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखा गया है.

युद्धकाल में क्या अंतिम संस्कार के नियम

शिया इस्लाम के नियमों में युद्धकाल या खतरे की स्थिति में शव को सामान्य रूप से गुस्ल यानि स्नान, कफन और जनाजा नमाज के बाद जल्द दफनाने की सलाह दी जाती है, लेकिन असाधारण परिस्थितियों में संरक्षण की अनुमति है.

खामेनेई की मौत के बाद दुनियाभर के शिया मुसलमान दुख जता रहे हैं.

शव किस तरह संरक्षित करके रखते हैं

शव को ठंडी, सूखी और सुरक्षित जगह पर रखा जाता है ताकि विघटन रुके; कभी-कभी प्राकृतिक ठंडक या बर्फ का उपयोग किया जाता है. कफन के बाद शव को लकड़ी के डिब्बे या सुरक्षित कमरे में बंद रखा जा सकता है, जब तक दफन संभव न हो. सुरक्षा जोखिम होने पर विद्वानों की सलाह से देरी जायज है. हालांकि रासायनिक संरक्षण यानि एम्बाल्मिंग इस्लाम में वर्जित है; प्राकृतिक तरीके ही अपनाए जाते हैं.

कैसे होता है सुपुर्द ए खाक 

ईरान एक शिया-बहुल देश है. वहां के अधिकांश मुसलमान तवेलवर शिया इस्लाम परंपरा का पालन करते हैं. इसलिए मृत्यु के बाद दफन के नियम भी शिया इस्लामी परंपरा के अनुसार होते हैं. इन परंपराओं में धार्मिक विधि, सादगी और जल्दी दफनाने पर बहुत ज़ोर दिया जाता है. वैसे शिया इस्लाम में सुपुर्द ए खाक की परंपरा इस तरह होती है.

1. मौत के बाद शरीर की तैयारी यानि ग़ुस्ल ए मैय्यत

जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो सबसे पहले शव को धार्मिक तरीके से धोया जाता है. इसे ग़ुस्ल-ए-मैय्यत कहते हैं. इस प्रक्रिया में शव को तीन बार धोने की परंपरा है
– पहले पानी में कपूर या इसी तरह की सुगंधित चीज़ मिलाकर
– फिर सामान्य पानी से
– आखिर में शुद्ध पानी से
ये काम आमतौर पर उसी लिंग के लोग करते हैं यानि पुरुष पार्थिव शरीर के लिए पुरुष और महिला के लिए महिलाएं. मृत शव को सात भागों सिर, दाहिना कंधा, बायां कंधा, दाहिना जांघ, बायां जांघ, दाहिना पैर, बायां पैर में पानी डालकर धोया जाता है.

2. कफ़न पहनाना

ग़ुस्ल के बाद शव को सफेद कपड़े में लपेटा जाता है जिसे कफ़न कहा जाता है. शिया परंपरा में आमतौर पर तीन कपड़े होते हैं, जिनका इसमें इस्तेमाल होता है. कफन के लिए पुरुष के लिए बिना सिली हुई पांच सफेद चादरें इसमें इस्तेमाल होती हैं. महिलाओं के लिए सात चादरें होती हैं.
– लंगोट जैसा कपड़ा
– लंबा लपेटने वाला कपड़ा
– ऊपर का बड़ा कफ़न
कभी-कभी कफ़न पर दुआएं या पवित्र वाक्य भी लिखे जाते हैं, खासकर इमामों के नाम पर.

3. हनूत यानि सुगंध लगाना

शिया परंपरा में हनूत नाम की एक खास प्रक्रिया होती है. इसमें कपूर को माथे, हाथ, घुटनों और पैरों के कुछ हिस्सों पर लगाया जाता है. यह माना जाता है कि इससे मृतक को सम्मान मिलता है. ये एक धार्मिक परंपरा है.

4. जनाज़े की नमाज़

दफन से पहले जनाज़े की नमाज़ पढ़ी जाती है. शिया परंपरा में नमाज़-ए-जनाज़ा में पांच तकबीर अल्लाहु अकबर कही जाती हैं. यह सुन्नी परंपरा से थोड़ा अलग है, जहां आमतौर पर चार तकबीर होती हैं.

5. जल्दी दफनाने की परंपरा

इस्लाम में आम तौर पर कोशिश की जाती है कि मृत्यु के 24 घंटे के भीतर दफन कर दिया जाए. ईरान में भी यही परंपरा है. शव को लंबे समय तक घर में नहीं रखा जाता, जब तक कि कानूनी या मेडिकल कारण न हों.

6. कब्र में दफनाने का तरीका

दफन करते समय कुछ खास नियम होते हैं. शव को सीधे जमीन में रखा जाता है. शरीर को दाईं करवट पर लिटाया जाता है. चेहरा मक्का की दिशा में रखा जाता है. मक्का की दिशा को क़िबला कहा जाता है, जो इस्लाम में प्रार्थना की दिशा भी है.

7. कब्र की बनावट

ईरान में कब्र आमतौर पर साधारण होती है. कई जगह कब्र के अंदर एक साइड में छोटा सा खांचा बनाया जाता है, जिसमें शव रखा जाता है. फिर ऊपर से मिट्टी भर दी जाती है. कब्र पर पत्थर लगाया जाता है जिस पर मृतक का नाम और तारीख लिखी होती है.

8. मातम और शोक की परंपरा

दफन के बाद शोक सभाएं होती हैं. ईरान में आमतौर पर तीसरे दिन, सातवें दिन और चालीसवें दिन पर पर विशेष दुआ और सभा होती है. चालीसवें दिन की रस्म को बहुत महत्व दिया जाता है. यह परंपरा इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ी याद से भी जुड़ी मानी जाती है. वैसे कई ईरानी मुसलमान चाहते हैं कि उन्हें पवित्र शिया स्थलों के पास दफन किया जाए.

कहां दफनाए जाएंगे खामनेई

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को मशहद शहर में इमाम रजा श्राइन के निकट दफनाने की योजना है. मशहद उनका जन्मस्थान है और शिया इस्लाम का प्रमुख तीर्थस्थल भी. उनके पद को देखते हुए श्राइन के महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्मारक जैसी सजावट संभव है.

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