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Birthday Stephen Hawking: मशहूर फिजिक्स और अंतरिक्ष वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का आज यानि 8 जनवरी को बर्थ-डे है. उनका जन्म ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में 1942 को हुआ था. उन्होंने कभी भगवान को नहीं माना. अपनी किताबों में लिखा कि क्यों वह भगवान को नहीं मानते. वह ये तर्क देते थे कि इस दुनिया को किसी ईश्वर ने नहीं बनाया. धर्म पर भी उनके विचार बहुत तल्ख थे.

स्टीफन हॉकिंग का जन्मदिन 8 जनवरी को होता है. उनका जन्मदिन मनाने का अंदाज़ बौद्धिक, मानवीय और कभी-कभी शरारती वैज्ञानिक किस्म का होता था. हॉकिंग आम तौर पर अपना जन्मदिन घर या कैम्ब्रिज में परिवार, बच्चों और करीबी दोस्तों के साथ छोटे, शांत समारोह में जन्मदिन मनाते थे. अपने जन्मदिन पर वो लोगों के साथ हंसी मजाक और खुद पर ह्यूमर करते थे. अब हम ये जानेंगे कि स्टीफन हॉकिंग का धर्म और ईश्वर को लेकर क्या मानना था.

अपने जन्मदिन पर वह ना कोई पूजा करते थे ना कोई प्रार्थना ना कोई धार्मिक अनुष्ठान. स्टीफन हॉकिंग का भगवान, आत्मा और आध्यात्म को लेकर दृष्टिकोण काफ़ी साफ था लेकिन विवादास्पद भी. वह खुद को वैज्ञानिक नास्तिक कहते थे. अपनी किताब ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम में हॉकिंग ने लिखा, वह प्रकृति को ही ईश्वर मानते हैं ना कि किसी शक्ति को. उन्होंने ये भी कहा कि दुनिया को किसी ईश्वर की जरूरत नहीं है.

वह कहते थे कि ब्रह्मांड के अस्तित्व और इसे चलाने के लिए किसी सृष्टिकर्ता भगवान की जरूरत नहीं है. ना ही किसी भगवान ने ब्रह्मांड को बनाया. उसके लिए भौतिक नियम ही पर्याप्त हैं. उनके अनुसार, ईश्वर की अवधारणा ज्ञान की कमी से पैदा हुई है. जैसे जैसे विज्ञान आगे बढ़ा, ईश्वर के बारे में विश्वास पीछे हटता चला गया.
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हॉकिंग आत्मा के अस्तित्व को स्पष्ट रूप से नकारते थे. वह कहते थे कि आत्मा की बातें केवल मस्तिष्क का भ्रम है. उन्होंने 2011 में द गार्डियन अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा, आत्मा कोई अलग, अमर सत्ता नहीं. जो लोग ये मानते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा जीवित रहती है, वो केवल मनुष्य की कल्पना है. उन्होंने इसे डर से पैदा हुई धारणा कहा.

स्टीफन हॉकिंग पुनर्जन्म और स्वर्ग-नरक को भी बिल्कुल नहीं मानते थे. कहते थे ये सब कुछ नहीं होता है. इसका वैज्ञानिक प्रमाण शून्य है. उनका कहना था कि ये सारी बातें केवल मनुष्य को सांत्वना देती हैं, सत्य नहीं बतातीं. वह धार्मिक आध्यात्म को भी नहीं मानते थे. उन्होंने धर्म को अवैज्ञानिक, सत्तात्मक और डर पर टिकी हुई कथित नैतिकता बताया.

वह साफ कहते थे कि धर्म ने इतिहास में विज्ञान की प्रगति को कई बार रोका. वह कहते थे कि मनुष्य का सच्चा “आध्यात्मिक अनुभव” तो हो सकता है लेकिन बिना ईश्वर के. बकौल उनके नियम समाज ने बनाए, ईश्वर ने नहीं. वह कहते थे कि पुराने समय में जब बिजली, भूकंप, रोग, मृत्यु समझ में नहीं आते थे, तब इसको ईश्वर से जोड़ दिया जाता था.

उन्होंने कहा, जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ा, वैसे वैसे जिन्हें रहस्य या ईश्वर की करामात माना गया, वो प्राकृतिक नियमों से समझाए जाने लगे. वह कहते थे कि धर्म के नाम पर आमतौर पर लोगों को डराया जाता है. स्वर्ग नरक और दंड की अवधारणा इसी पर टिकी हुई है. वह कहते थे कि डर पर टिकी नैतिकता कमज़ोर नैतिकता है.

स्टीफन हॉकिंग संगठित धर्म पर तीखी आलोचना करते थे. कभी कभी उन्होंने इसके लिए कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. चर्च, पादरी, मौलवी, पुजारी और धार्मिक संस्थाएं सत्ता के साथ गठजोड़ करती हैं ताकि लोगों को सवाल पूछने से रोका जाए. उनका कहना था, धर्म के ठेकेदार कहते हैं कि धर्म में ये कहा गया है इसलिए मानो जबकि विज्ञान कहता है कि साबित करो फिर मानेंगे.

क्या वे सभी धर्मों को एक जैसा मानते थे? इसका जवाब है – नहीं. उन्होंने सबसे ज्यादा आलोचना ईसाई धर्म की की. हालांकि उन्होंने इस्लाम, हिंदू या बौद्ध धर्म पर कम बोला लेकिन सिद्धांत वही लागू किया. वह कहते थे कि कोई भी धर्म जो अलौकिक दावे करता है, वैज्ञानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता.

स्टीफन हॉकिंग धार्मिक स्थानों पर जरूर गए लेकिन श्रद्धालु के रूप में नहीं. वह कई बार चर्च गए. अगर किसी धार्मिक इमारत में गए भी, तो वास्तुकला और इतिहास के कारण. उन्होंने अपने जीवन में कई बार पादरियों, धर्मशास्त्रियों और दार्शनिकों से बहस की. क्या भगवान होता है- जैसे सवालों पर मंचों को साझा किया. लेकिन लेकिन कभी आस्था की ओर झुकाव नहीं दिखाया.





