कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी दो दिन बाद 26 फरवरी को भारत दौरे पर आने वाले हैं. उनके इस दौरे से पहले कनाडा सरकार तहव्वुर राणा के खिलाफ बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. खबर है कि कनाडा सरकार ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले के कथित मास्टरमाइंड ताहव्वुर हुसैन राणा की कनाडाई नागरिकता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, राणा पर आरोप है कि उसने नागरिकता के लिए आवेदन करते समय जानबूझकर गलत जानकारी दी थी, जिसके आधार पर उसे वर्ष 2001 में कनाडा की नागरिकता मिल गई.
65 वर्षीय ताहव्वुर राणा का जन्म पाकिस्तान में हुआ था. वह वर्ष 1997 में कनाडा आया और साल 2000 में नागरिकता के लिए आवेदन किया. आवेदन में उसने दावा किया कि वह पिछले चार वर्षों से ओटावा और टोरंटो में रह रहा था और इस दौरान केवल छह दिन के लिए ही कनाडा से बाहर गया था. हालांकि, रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) की जांच में सामने आया कि उस समय राणा का अधिकांश वक्त अमेरिका के शिकागो में बीत रहा था, जहां उसकी कई संपत्तियां और व्यवसाय थे, जिनमें एक इमिग्रेशन फर्म और एक किराना स्टोर भी शामिल था.
कनाडा के इमिग्रेशन विभाग इमिग्रेशन, रिफ्यूजीज़ एंड सिटिजनशिप कनाडा (IRCC) ने अपने फैसले में कहा है कि राणा ने ‘गंभीर और जानबूझकर धोखा’ दिया. विभाग के अनुसार, नागरिकता रद्द करने की यह कार्रवाई आतंकवाद के आरोपों की वजह से नहीं, बल्कि नागरिकता आवेदन में गलत जानकारी देने के कारण की जा रही है.
IRCC ने 31 मई 2024 को राणा को लिखे पत्र में कहा कि उसने कनाडा में अपने निवास से जुड़ी जानकारी छिपाई, जिससे अधिकारियों को यह गलतफहमी हुई कि वह नागरिकता के लिए जरूरी निवास शर्तों को पूरा करता है. इसी आधार पर उसे नागरिकता दे दी गई, जो अब नियमों के खिलाफ पाई गई है.
फिलहाल ताहव्वुर राणा भारत की हिरासत में है और उस पर 2008 के मुंबई आतंकी हमले में भूमिका निभाने के आरोप हैं, जिसमें 166 लोगों की जान गई थी. यह हमला पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा द्वारा अंजाम दिया गया था.
कनाडा सरकार ने राणा का मामला फेडरल कोर्ट ऑफ कनाडा को सौंप दिया है. अब अदालत ही यह अंतिम फैसला करेगी कि नागरिकता धोखे से हासिल की गई थी या नहीं. राणा के वकील ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है और इसे उसके अधिकारों का उल्लंघन बताया है.
कनाडा सरकार का कहना है कि नागरिकता रद्द करना कोई आसान फैसला नहीं होता, लेकिन नागरिकता कानूनों की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह जरूरी कदम है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में इस तरह के केवल तीन ही मामले सामने आए हैं.





