‘स्क्रोल’ में इस बारे में अजय कमलाकरन की लंबी ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जो बताती है कि जिन्ना के इस देश का बंटवारा करके पाकिस्तान बनाने की योजना से देश के बहुत से मुस्लिम और मुस्लिम संगठन नाराज थे. वो नहीं चाहते थे कि जिन्ना इस योजना पर आगे बढ़ें और देश दो हिस्सों में बंटा जाए.
कौन था ये युवक
उसने एक इलेक्ट्रीशियन के रूप में काम किया. छोटे-मोटे अपराध किए. जेल में कुछ समय बिताया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अहरार पार्टी में शामिल हुआ. आखिरकार वो खाकसार आंदोलन से जुड़ गया.ये आंदोलन इस्लामी विद्वान अल्लामा इनायतुल्लाह खान मशरिकी के नेतृत्व वाला एक अर्धसैनिक समूह था. ये समूह पाकिस्तान के निर्माण का विरोध करता था. मानता था कि मुसलमान एक अखंड भारत में ही बेहतर जिंदगी जी सकते हैं.

मोहम्मद अली जिन्ना के कहने पर ही ब्रिटिश सरकार देश के बंटवारे का बिल लेकर आई थी. (Photo-AP)
कई ट्रेन बदलते हुए बेटिकट मुंबई पहुंचा
तब उसने दिल्ली से कानपुर के लिए ट्रेन पकड़ी. वहां कुछ घंटे बिताए. वहां से मुगलसराय गया. फिर बांबे. दरअसल उसने ये पूरी यात्रा बेटिकट होकर की. इसलिए वह हर स्टेशन पर ट्रेन बदलते हुए बांबे पहुंचा. जब वह जिन्ना के मालाबार स्थिति बंगले में उनसे मिलने पहुंचा तो उससे पिछली रात ही बांबे वीटी स्टेशन पर उतरा था.”
वह रात में बाजार में घूमा, फुटपाथ पर सोया. मस्जिद में नहाया. उसका दावा था कि वह किसी भी तरह बस जिन्ना से मिलकर उनसे बात करना चाहता था. ताकि उनसे कह सके कि वो बंटवारे की योजना छोड़ दें. मुस्लिम लीग के एक सदस्य ने उसको जिन्ना के माउंट प्लीजेंट रोड स्थित बंगले का पता दिया था.
हल्ला होने पर जिन्ना वहां पहुंचे
तब उसने जिन्ना के सामने ही उनसे कहा कि उसे उनसे मिलना है. जिन्ना ने कहा, वह बहुत बिजी हैं. उनके पास समय नहीं है. वह सेक्रेट्री से समय ले ले और एक दो दिन बाद आकर मिल ले.

मोहम्मद अली जिन्ना का मुंबई में मालाबार हिल्स स्थित बंगला, जिसको उन्होंने बनवाया था, जिसके स्वामित्व के लिए अब तक विवाद चल रहा है.
तब उसने जिन्ना के जबड़े पर घूंसा मारा, चाकू निकाला

युवक का आरोप जिन्ना ने उसे गालियां दीं
मोजांगवी ने कहा, “मैं खड़ा हुआ और सलाम करके मिस्टर जिन्ना को समझाया कि मैं उनसे मिलने के लिए इतनी लंबी यात्रा करके आया हूं. उनसे मेरी बात सुनने का अनुरोध किया. मिस्टर जिन्ना ने मना कर दिया. दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए अंग्रेज़ी में कहा, ‘गेट आउट’ या ‘वॉक आउट’. मुझे याद नहीं कि उन्होंने कौन सा मुहावरा इस्तेमाल किया. उनके शब्दों का आशय यही था कि मुझे वहां से चले जाना चाहिए. मैं अंग्रेज़ी इतनी समझता हूं कि जान सकता हूं कि क्या कहा जा रहा है.”

मोजांगवी ने कहा कि उसने जाने से इनकार कर दिया. फिर जिन्ना से मिलने का अनुरोध किया. जिन्ना “गुस्से में आ गए”. उसे गालियां दीं, “कुत्ता” और “ज़लील” कहा. दावा किया कि जिन्ना के नौकरों ने उसको कमरे से बाहर धकेलने की कोशिश की. उस पर हमला किया. “मैंने भी जवाबी कार्रवाई में मुक्कों का इस्तेमाल किया,” उसने कहा, “जिन्ना पास ही खड़े थे. संघर्ष के दौरान, मुझे अपनी जेब में रखे एक चाकू की याद आई. मैंने आत्मरक्षा में उसे निकाला. मैं नहीं बता सकता कि जिन्ना कैसे घायल हुए.”
युवक को लगा कि जिन्ना सबके साथ अन्याय कर रहे हैं
उसने आगे कहा, उसका मानना है कि जिन्ना में गांधी के साथ रचनात्मक बातचीत करने की ईमानदारी की कमी थी. “मैं इस मामले में जिन्ना के रवैये से असहमत हूं. मानता हूं कि वे मुसलमानों और कुल मिलाकर भारत के साथ अन्याय कर रहे हैं. इस मामले पर गहराई से विचार करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं जिन्ना की असली नीति आत्म-प्रशंसा है. सभी भारतीयों के पारस्परिक लाभ के लिए कुछ भी करने की उनकी कोई वास्तविक इच्छा नहीं है.”
जिन्ना ने आरोप लगाया – ये उनकी हत्या की साजिश

मुंबई में सनसनी फैल गई
बम्बई पुलिस ने लाहौर में संपर्क किया. वह जानना चाहती थी कि जिन्ना पर हमला किसी गंभीर साजिश का तो नतीजा नहीं है. जिन्ना का मानना था कि ये हमला खाकसार नेता अल्लामा मशरिकी द्वारा कराया गया था.”अंग्रेज कमिश्नर कोलविले से जिन्ना ने कहा, मशरिकी बहुत ही अविवेकी और जिद्दी और हठी शख्स हैं.” जिन्ना को यही लग रहा था कि इस हमले के पीछे मशरीकी का हाथ हो सकता है.
कैसे साजिश में खाकसार आंदोलन का नाम आया
नवंबर 1943 में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मोजांगवी को पांच साल के कारावास की सज़ा सुनाई. अदालत ने पाया कि इस हमले और खाकसार आंदोलन के बीच कोई संबंध नहीं था. हालांकि 1943 के पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि उस साल खाकसार आंदोलन के सदस्यों ने जिन्ना की हत्या की एक और साजिश रची थी.जिसे नाकाम कर दिया गया. ये बात सच थी कि खाकसार कतई जिन्ना से खुश नहीं थे लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि खाकसार ने जिन्ना की हत्या की कोई साजिश रची.
खाकसार आंदोलन के प्रमुख मशरिकी ने आखिर तक भारत के विभाजन का विरोध किया. पाकिस्तान बनने के बाद वह वहां चले गए. उसके नागरिक बन गए. 1963 में अपनी मृत्यु तक वह राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे.





