ट्रंप टैरिफ से लेकर कूटनीतिक अवसर तक: अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए. इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक झटका माना गया. लेकिन पीएम मोदी ने हार नहीं मानी. किसानों, छोटे उद्योगों और देश के हितों के लिए किसी भी दबाव का सामना करने की घोषणा की. इसके तुरंत बाद मोदी ने कूटनीतिक कदम उठाते हुए ब्राजील के राष्ट्रपति लूला, रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से बातचीत की. शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) सम्मेलन में उनकी भागीदारी ने अमेरिका को असहज कर दिया. अमेरिका के पूर्व सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा कि ट्रंप की कार्रवाई ने मोदी को रूस-चीन ब्लॉक के करीब ला दिया.
अतीत से ही संघर्ष: 2002 में गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी का राजनीतिक जीवन खतरे में था. लेकिन उस संकट को पार कर उन्होंने गुजरात को एक विकासशील राज्य के रूप में खड़ा किया. उस मॉडल ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया. इसी तरह कोरोना के समय भी आलोचनाओं का सामना करते हुए दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम लागू कर भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले गए.
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: तीसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी ने पश्चिमी दबाव का सामना करते हुए ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में खड़े हुए. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बुलावे को नजरअंदाज कर, भारतीय हितों को प्राथमिकता दी. परिणामस्वरूप, वैश्विक स्तर पर मोदी की स्वीकृति दर 75 प्रतिशत से अधिक हो गई.
प्रधानमंत्री के 75वें जन्मदिन का स्वागत करते हुए, उनके राजनीतिक जीवन के अंत की भविष्यवाणी करने वालों की उम्मीदें धूमिल हो गई हैं. चाहे जितनी भी चुनौतियां हों, मोदी उन्हें जीत की सीढ़ियों में बदलते हुए भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक विशेष अध्याय लिख रहे हैं.





