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Delhi University Removed Manusmriti: क्या है शुक्रनीति जिसे अब डीयू में पढ़ाया जाएगा, मनुस्मृति को सिलेबस से क्यों हटाया गया

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Delhi University Removed Manusmriti: दिल्ली विश्वविद्यालय ने एमए संस्कृत पाठ्यक्रम से मनुस्मृति हटाकर शुक्रनीति को शामिल किया है. छात्र अब प्राचीन भारतीय शासन, नैतिकता और शुक्राचार्य की नीतियों का अध्ययन करेंगे.

क्या है शुक्रनीति जिसे अब डीयू में पढ़ाया जाएगा, मनुस्मृति को क्यों हटाया गयामनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने पर आपत्तियां जताई गई थीं.
Delhi University Removed Manusmriti: दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) ने अपने एमए संस्कृत के तीसरे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम से मनुस्मृति (Manusmriti) को हटाकर उसकी जगह शुक्राचार्य से संबंधित एक प्राचीन ग्रंथ शुक्रनीति (Shukraniti) को शामिल कर लिया है. यह निर्णय दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह ने अपनी आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए लिया है और इसे विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (ईसी) के समक्ष रखा जाएगा, जिसकी बैठक इस महीने के अंत में होगी. स्वीकृत पाठ्यक्रम के अनुसार यह पेपर एमए तृतीय सेमेस्टर के छात्रों के लिए एक वैकल्पिक विषय है. इस पेपर का उद्देश्य छात्रों को प्राचीन भारतीय प्रशासनिक मॉडलों, शासन के नैतिक आधारों और शुक्रनीति में उल्लिखित राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा की रणनीतियों की समझ प्रदान करना है.

यह कार्रवाई विपक्षी दलों और नागरिक समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर कई सप्ताह तक किए गए विरोध प्रदर्शन की वजह से की गई है. जिन्होंने मनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई थी. एक रिपोर्ट के मुताबिक एक शिक्षक ने कहा कि वे गैर-विवादास्पद भाग पढ़ा रहे थे, लेकिन विवाद खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने कहा, “हम कोई विभाजनकारी बात नहीं पढ़ा रहे थे. लेकिन सोशल मीडिया पर बार-बार परेशान किए जाने के बाद हमें ये बदलाव करने पड़े.”

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किस बात पर थी आपत्ति
पहली बार जून में खबर आयी थी कि संस्कृत विभाग ने मनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया है. जिसके बाद कुलपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर साफ किया कि यह पाठ डीयू के किसी भी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया जाएगा और इसे हटा दिया जाएगा. इससे पहले भी मनुस्मृति को विधि और इतिहास जैसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने के लिए इसी तरह के प्रस्ताव लाए गए थे. लेकिन कड़ी आपत्तियों का सामना करना पड़ा और उन्हें वापस लेना पड़ा. कुलपति ने हर बार दोहराया कि यह पाठ विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाएगा. मनुस्मृति को जाति और महिलाओं की स्थिति पर अपने निर्देशात्मक और भेदभावपूर्ण विचारों के कारण व्यापक रूप से विवादास्पद माना जाता है, जिन्हें आधुनिक समाज में अन्यायपूर्ण और पुराना माना जाता है. इस ग्रंथ को शिक्षाविदों, छात्रों और सामाजिक समूहों की ओर से आलोचना का सामना करना पड़ा है. कई लोगों का तर्क है कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में इसे शामिल करने से प्रतिगामी विचारों को वैधता मिलती है.

मनुस्मृति से वे श्लोक हटा दिए गए हैं जिनमें धर्म, संस्कार, वन जीवन, राजसी दायित्व, पुत्र का वर्गीकरण और प्रायश्चित का उल्लेख है. 

क्या होगा संशोधित पाठ्यक्रम में
अब शुक्रनीति के आगमन के साथ विद्यार्थी प्राचीन भारत में प्रचलित शासन-कला, नैतिकता और प्रशासन की शिक्षा लेंगे. संशोधित पाठ्यक्रम में राज्य संसाधनों का प्रबंधन, नैतिक शासन, राष्ट्रवाद, सैन्य रणनीति और किलेबंदी तकनीक शामिल हैं. हिंदू धर्म में असुरों के गुरु शुक्राचार्य को समर्पित यह ग्रंथ रक्षा और राजनीतिक मामलों में अपनी व्यावहारिकता के लिए प्रसिद्ध है. मनुस्मृति, जो धार्मिक रीति-रिवाजों और सामाजिक दायित्वों पर आधारित है, की तुलना में शुक्रनीति ऐसी सलाह देती है जिसका नीतिगत अध्ययनों पर सीधा प्रभाव पड़ता है. सुझाए गए पठन सामग्री में धर्मशास्त्र और हिंदू कानूनों के इतिहास पर आधारित रचनाएं शामिल हैं, जो पाठ के लिए व्यापक संदर्भ प्रदान करती हैं.

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शुक्राचार्य हैं इस नीति ग्रंथ के लेखक
शुक्रनीति को शुक्राचार्य द्वारा लिखा गया एक नीति ग्रंथ माना जाता है. शुक्राचार्य को असुरों का गुरु और महान विद्वान माना जाता था. यह ग्रंथ शासन कला और प्रशासन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है, जिसमें राजा के कर्तव्य, मंत्री परिषद का गठन, न्याय व्यवस्था, कराधान और सैन्य संगठन जैसे विषय शामिल हैं.

मुख्य तथ्य और विषय वस्तु
राज्य और राजा:
शुक्रनीति में राज्य को सात अंगों (सप्तांग) से बना माना गया है, जिसमें राजा, मंत्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग (किले) और बल (सेना) शामिल हैं. इसमें एक आदर्श राजा के गुणों जैसे कि न्यायप्रियता, विद्वत्ता और प्रजा के प्रति समर्पण का वर्णन है.
प्रशासन और मंत्री परिषद: ग्रंथ में मंत्रियों के वर्गीकरण और उनके कार्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है. यह बताता है कि एक कुशल मंत्री परिषद कैसे शासन को सुचारू रूप से चलाने में मदद करती है.
न्याय व्यवस्था: शुक्रनीति न्याय के महत्व पर जोर देती है और बताती है कि राजा को निष्पक्ष और त्वरित न्याय कैसे सुनिश्चित करना चाहिए. इसमें दोषियों के लिए विभिन्न दंडों का भी उल्लेख है.
अर्थव्यवस्था और कराधान: ग्रंथ में कराधान के सिद्धांतों का उल्लेख है, जिसमें यह बताया गया है कि कर प्रजा पर बोझ न बनें और उनका उपयोग लोक कल्याण के लिए किया जाए.
सैन्य और विदेश नीति: शुक्रनीति सैन्य संगठन, युद्ध की रणनीतियों और कूटनीति पर भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देती है. इसमें शत्रु और मित्र राज्यों के साथ व्यवहार करने के तरीकों का वर्णन है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के मामले में यह विकल्प राजनीतिक और बौद्धिक है. यह संस्थान को एक सुलगते सांस्कृतिक युद्ध से बचाता है और साथ ही पाठ्यक्रम में शासन पर शोध और अध्ययन को भी शामिल रखता है. अब सभी की निगाहें कार्यकारी परिषद की बैठक पर टिकी हैं, जिसमें यह तय होगा कि यह निर्णय बरकरार रहेगा या नहीं. साथ ही यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि क्या अन्य विश्वविद्यालय भी इसी तरह का कदम उठाएंगे.

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