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Great Nicobar Project: क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना, जिसके खिलाफ उठ रही विरोध की आवाज, जानें वजह

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Great Nicobar Project: पिछले पांच सालों में केंद्र सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को भारत की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण जगह बनाने की कोशिश की है. इसका उद्देश्य यह है कि यह द्वीप भारत के पूर्वी हिस्से में एक सुरक्षा दीवार के रूप में काम करे और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के हितों की रक्षा करे. इसके लिए सरकार ने यहां कई बड़े काम किए हैं. हवाई अड्डों और बंदरगाहों को ठीक किया गया है. सेना के लिए सामान रखने और रहने की जगह बनाई गई है. निगरानी के लिए मजबूत सिस्टम लगाए गए हैं, ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक बड़ा बदलाव किया जा रहा है, जिसमें एक नया अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, एक नया हवाई अड्डा, एक टाउनशिप, और एक गैस और सौर-आधारित बिजली घर बनाना शामिल है.

लेकिन इस विकास से कुछ समस्याएं भी सामने आयी हैं. चीन की बढ़ती नौसेना शक्ति के कारण बंगाल की खाड़ी का महत्व बढ़ गया है. लेकिन नागरिक समाज और वन्यजीव विशेषज्ञ इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे यहां के मूल निवासियों खासकर शोम्पेन लोगों को नुकसान पहुंचाएगा. इससे यहां के प्रवाल भित्तियों और समुद्री जीवन पर बुरा असर पड़ेगा. निकोबार मेगापोड पक्षी और लेदरबैक कछुओं जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों को खतरा होगा.

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सोनिया गांधी ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी ने एक बार फिर ग्रेट निकोबार परियोजना पर निशाना साधा है. सोमवार को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख में सोनिया गांधी ने इसकी निंदा करते हुए इसे एक ‘सुनियोजित दुस्साहस’ बताया और तर्क दिया कि यह आदिवासी अधिकारों का हनन करती है और महत्वपूर्ण संवैधानिक, कानूनी और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की अनदेखी करती है. उन्होंने एक आने वाली इकोलॉजिकल और आदिवासी आपदा की भी चेतावनी दी. निकोबारी लोग विकास क्षेत्र के भीतर स्थित अपने पैतृक गांवों से स्थायी रूप से विस्थापित हो जाएंगे. सोनिया गांधी के लेख में चौंका देने वाले पैमाने पर वनों की कटाई का भी आरोप लगाया गया. जिसमें 850,000 (8.5 लाख) से 5.8 मिलियन (58 लाख) पेड़ों के नुकसान का अनुमान लगाया गया है. उन्होंने कम्पसेंट्री वनीकरण के लिए सरकार के नजरिये की आलोचना की. 

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क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?
ग्रेट निकोबार परियोजना बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप के लिए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित एक बड़े पैमाने की इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास योजना है. यह ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, बिजली और टाउनशिप सुविधाओं के निर्माण हेतु अरबों डॉलर की एक रणनीतिक और इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है. जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा. इस परियोजना को 2022 में पर्यावरण और वन मंजूरी मिल गयी थी. परियोजना की कुल लागत लगभग 81,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है. नीति आयोग के नेतृत्व में और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम (एएनआईआईडीसीओ) के माध्यम से कार्यान्वित इस परियोजना का उद्देश्य ग्रेट निकोबार को सामरिक, आर्थिक और पर्यटन महत्व के केंद्र में बदलना है. इसमें शामिल हैं…

अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल: गैलेथिया खाड़ी में एक गहरे समुद्र का बंदरगाह जिसकी क्षमता लगभग 16 मिलियन TEU है. इसे दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेनों में से एक मलक्का जलडमरूमध्य (Strait) के निकट ग्रेट निकोबार की स्थिति का लाभ मिलेगा.

ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: नागरिक और रक्षा दोनों जरूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया. अनुमान है कि 2050 तक इसकी यात्री क्षमता लगभग 4,000 प्रति घंटा होगी.

टाउनशिप विकास: लगभग 300,000 से 400,000 लोगों के लिए एक नियोजित शहर, जिसमें आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत स्थान शामिल हों.

पॉवर प्लांट्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर: 450 एमवीए गैस एवं सौर-आधारित पॉवर प्लांट्स, साथ ही सड़कें, जलापूर्ति एवं सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर.

सामरिक महत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा: ग्रेट निकोबार परियोजना न केवल बुनियादी ढांचे और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत के लिए रणनीतिक महत्व भी रखता है.

मलक्का जलडमरूमध्य के निकट रणनीतिक स्थान
ग्रेट निकोबार सिक्स डिग्री चैनल के निकट स्थित है जो मलक्का जलडमरूमध्य के पास एक महत्वपूर्ण मार्ग है. जहां से 30-40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और चीन का अधिकांश ऊर्जा आयात होता है. एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह और हवाई अड्डे का विकास करके भारत दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स में से एक के माध्यम से समुद्री यातायात की निगरानी और सुरक्षा कर सकता है. इससे हिंद महासागर में चीन की उपस्थिति को संतुलित करने की भारत की क्षमता बढ़ती है. खासकर बीजिंग की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के विरुद्ध. जिसमें हिंद महासागर में बंदरगाहों और सुविधाओं का एक नेटवर्क शामिल है.

सैन्य और नौसैनिक लाभ
नियोजित दोहरे उपयोग वाला यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागरिक और रक्षा दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करेगा. जिससे भारत की एकमात्र त्रि-सेवा कमान अंडमान और निकोबार कमान में नौसेना और वायु सेना की त्वरित तैनाती संभव होगी. इससे अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी प्रमुख समुद्री क्षेत्रों जहां बाहरी शक्तियां सक्रिय हैं पर भारत की निगरानी मजबूत होगी.

समुद्र में जागरूकता
बंदरगाह और सहायक बुनियादी ढांचा भारत के नौवहन मार्गों पर नजर रखने निगरानी करने और नियंत्रण करने की क्षमता में सुधार करेगा. यह क्वाड सुरक्षा पहलों (अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ) में भारत की भूमिका को मजबूत करेगा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त और खुला नौवहन सुनिश्चित करेगा.

आपदा प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय सुरक्षा
2004 की सुनामी ने इस क्षेत्र की कमजोरी को उजागर किया था. ग्रेट निकोबार में एक आधुनिक बंदरगाह और हवाई अड्डा मानवीय सहायता और आपदा राहत क्षमताओं को बढ़ाएगा. जिससे भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में आपदा प्रतिक्रिया में तेजी से कार्य कर सकेगा और इस क्षेत्र में एक सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी छवि बेहतर बना सकेगा.

इकोलॉाजिकल प्रभाव: विपक्षी नेताओं ने बड़े पैमाने पर वनों की कटाई (8 लाख से ज्यादा पेड़) और दुर्लभ प्रजातियों (जैसे निकोबार मेगापोड और लेदरबैक कछुए) पर खतरे को लेकर चिंता व्यक्त की है. कांग्रेस सांसद और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, “केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय दावा कर रहा है कि 8.5 लाख पेड़ काटे जाएंगे. लेकिन  एक अनुमान के अनुसार यह संख्या 32 लाख से 58 लाख पेड़ों के बीच हो सकती है.” पिछले साल एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा था कि आगे बढ़ने का एकमात्र समझदारी भरा तरीका यही है कि इस विनाशकारी परियोजना को रोक दिया जाए और एक स्वतंत्र और पेशेवर रूप से सक्षम टीम द्वारा इसकी गहन समीक्षा की जाए. उन्होंने आगे कहा कि अहंकार और प्रतिष्ठा को किनारे रखना होगा.

स्वदेशी समुदाय: शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों जो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) हैं, पर संभावित विस्थापन और सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर भी चिंताएं जतायी गयी हैं. पिछले हफ्ते कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम को पत्र लिखकर परियोजना को मंजूरी देने में वन अधिकार अधिनियम के कथित उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की थी. उन्होंने सरकार से कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने का आग्रह किया. राहुल गांधी ने अपने पत्र में कहा, “आदिवासी समुदाय 2004 की सुनामी के दौरान विस्थापित हो गए थे और अपनी पैतृक भूमि पर वापस नहीं लौट पाए हैं. अब उन्हें डर है कि यह परियोजना उनकी जीवन शैली के लिए खतरा बन जाएगी और उनकी जमीन के हस्तांतरण के कारण उन्हें और हाशिए पर धकेल देगी.”

भूकंपीय जोखिम: ग्रेट निकोबार 2004 की सुनामी से प्रभावित होने के कारण एक उच्च जोखिम वाले भूकंप और सुनामी क्षेत्र में स्थित है. कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने पिछले साल कहा था, “2004 की सुनामी के दौरान यह द्वीप लगभग 15 फीट नीचे धंस गया था. उच्च जोखिम वाले भूकंपीय क्षेत्र में इतना बड़ा बुनियादी ढांचा बनाना आपदा को न्योता देना है.”

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